एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
मेरी बात
ऐ जिन्दगी, तेरा शुक्रिया!
Apr 2nd
बात मेरे अन्तर-स्नातक की पढ़ाई शुरु करने के तुरंत बाद से शुरु होती है. नया नया कॉलेज वह भी मॉर्निंग. मेरे दो दोस्त भी बन गये थे. अच्छी जमती थी हमारी. गर्मी से लेकर सर्दियों तक सुबह सुबह पसीने में नहाते, बारिश में भींगते या ठिठुरते हुए कालेज जाना अभी भी याद आता है. बस यही कोई बीस साल हुए हैं जब हमारी जवानी उफान पर थी, जो पिता के फटे हुए पायजामों से बने हुए झोलों में समोसे तलाश करने से लेकर उनके जेब से निकलते कुछ हरे पत्तों की रंगीनियों तक के मजे लिया करती थी.
पर मूछों के उग आने से पहले होने वाले अनुभवों ने समोसे में छिपे दूध वाले के बकाये का स्वाद भी चखाने लगी थी. तीन हमउम्र युवक के सपने तो एक जैसे हो सकते हैं पर उनके परिवारों में फर्क होने की वजह से उनके जोश में जमीन आसमान का अंतर हुआ करता था. जो एक को तो राजदूत की सवारी को प्रोत्साहित करती थी और दो को ट्यूशन तक के पैसे बचाने के लिए प्रेरित करती थी. हमें मालूम रहता था की पटना में सबसे टिकाऊ चप्पल कहाँ मिला करती है. वहीं मेरे दोस्त को यह पता हुआ करता था की सबसे अच्छी रसमलाई कहाँ मिलेगी.
दबी दबी महत्वाकांक्षाओं के साथ हम फिर भी जिये जा रहे थे कि एक समय आया जब अन्तर-स्नातक परीक्षा का परिणाम आया जो हम सबके सर पर कुछ ऐसा पड़ा कि सारी मस्ती हवा हो गयी. परिणाम पिताजी की आँखों में कुछ इस तरह बस गया कि हमारे लिये जगह ही ना रही. यह तो बाद में समझ आया कि वे निराशा थी न कि गुस्सा जो हम समझ रहे थे. बाद में निर्णय लिया गया कि मैं शहर में रहूँगा तो कुछ नही कर पाऊँगा तो अच्छा होगा कि गाँव जा कर रहा जाय.
अब गाँव की आबो-हवा कुछ ऐसी थी कि हम तो वहीं रम गये. दरअसल हमारा गाँव हिन्दुस्तान के कई शहरों से भी बड़ा है शायद उसी की वजह से कई लोग उसे बड़का गाँव बुलाते हैं. वैसे नाम इसमें केवल २६ मुहल्ले (जो कि स्वयम में छोटे-छोटे गाँव हैं), करीब पाँच पंचायत और दो या तीन डाक-घर और एक थाना है.
अब इतने बड़े गाँव में प्रतिभा की कमी तो हो ही नहीं सकती, खासकर जब क्रिकेट खेलने की बात हो. एक क्रिकेट टीम चला करती थी पर उसमें हमसे बड़े लोग खेला करते थे जो अपनी बेरोजगारी को भुलाने के लिये इतना अच्छा खेलते थे कि कई तो दशक से उपर का रिकॉर्ड बना चुके थे. उनकी क्रिकेट प्रतिभा की तुलना अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से हो जाती थी और वही उनका पारितोषक भी था और प्रेरणा भी. इसकी वजह से हमें गाँव की टीम में जगह मिलना मुश्किल हो रहा था. फिर हमने उपाय कर के एक ‘बी’ टीम बना ली और उसी में खेलने लगे. यह एक अलग बात है कि मुझे न तो बैट पकड़ना आता था और ना ही बॉल, फिल्डिंग में भी हम दोयम दर्जे के ही रहे. पर कमजोर होने की वजह से कभी कभी बॉल फेंकते समय हाथ घूम जाता तो बॉल स्वयम घूम जाती और लोग उसे फिरकी का नाम देते. पर हमारे अपने ही टीम के लोग उसे बेरहमी से मार मार कर बॉल को हवा में और मेरा मनोबल जमीन के नीचे पहुँचा देते. ऐसा करने वालों मे अमूमन करीबी दोस्त हुआ करते थे. वो कहते हैं ना कि जिसे यार ने मारा उसका तो खुदा ही मालिक. अब मालिक को तो रहम कहीं और खाना था तो इस समय वह हमें आवारा करार दे ध्यान देना बंद किये हुए था.
खैर! दूसरे सीजन के बीतते बीतते मेरा भी उत्साह जा चुका था. बाद में ताश और शतरंज वगैरह भी शुरु हुआ पर मैं बेचैन आत्मा कहीं ठौर न पाया. हाँ इस बीच जिस काम के लिये मुझे गाँव भेजा गया था वह ठंडे बस्ते में पड़ी थी, बी० कॉम की पढ़ाई. वैसे भी मैं कोई काम निरंतर नहीं कर पाया आज तक. सिगरेट और शराब भी मुझे भाने लगे थे पर उसमें भी पैसे की तंगी ने मनोबल नहीं बढ़ने दिया.
देखते देखते मैंने तीन सालों में बी० कॉम का दो सत्र बिता दिया, और पढ़ाई मेरी इतनी शानदार थी कि दोनो गत वर्षों से धकेल कर तीसरे सत्र में तो भेज दिये गये पर विश्वविद्यालय ने मुख्य विषयों में मुझे लटकाये रक्खा. जिसका मतलब था कि मुझे तीनों सालों के ऑनर्स के पेपर एक ही साल में निकालने थे अन्यथा पास कोर्स की डिग्री थमा कर विदा कर दिये जाते. ऐसा इसलिये हुआ कि हमें मुख्य विषयों में ३० से ऊपर परन्तु ४५ से कम प्रतिशत हासिल होते. और मजे की बात थी की अतिरिक्त विषय में नम्बर जैसे अपने आप ही आ जाते. ऐसा नहीं है कि पढ़ाई के नाम पर मेरा कोई योगदान नहीं था. मुझे हमेशा लगता कि नोट्स मुझे स्वयम बनाने चाहिये और वही मुझे ज्यादा अच्छे नम्बर दिलवायेगा. परन्तु शायद मेरा सोचना गलत था. और मैं आज भी यह मानता हूँ कि हमारे उत्तर-पुस्तिका परीक्षक इमानदारी नहीं बरतते. इसके पीछे का तर्क यह है कि जब मैंने उन्हीं विषयों की परीक्षा को अंग्रेजी में उतनी ही पढ़ाई कर के दिया तो मैं सारे विषय में पास होते हुए प्रथम श्रेणी से पास हुआ. अंततः जान छूटी.
पर दूसरे सत्र की परीक्षा होते होते तीन कैलेंडर सत्र बीत चुका था सो उसकी चिन्ता ना करते हुए मैं पटना अपने पिता के पास वापस आ गया. उनकी निराशा अब पक्की हो चुकी थी. पर मैं उन्हीं के पास वापस पटना लौट चुका था. उनसे कह दिया कि अब मैं कुछ काम करूँगा. इम्तहान जब होगी तब दे आऊँगा. उन्हें कोई खुशी तो न हुई पर करते भी क्या. इस बीच तीन में से एक मित्र की शादी हो गयी थी, शायद एक बच्चा भी था. वह कम्प्यूटर की पढ़ाई कर के उसी विधा में शिक्षक बन चुका था. कुछ और भी काम करता था जो मेरी समझ में उस समय नहीं आया. दूसरा एक कम्पनी में कम्प्युटर ऑपरेटर का काम कर रहा था.
मैंने अपने शिक्षक मित्र से कहा कि मुझे हो सके तो कोई काम दिलवा दे. यह एक गलती थी.
खैर यह गलती मैंने भी की और एक कम्प्युटर पढ़ाने वाली संस्था में मार्केटिंग का काम ले लिया. एवज में मुझे एक साल का कोर्स और कुछ पैसे मिलने थे, उसी संस्था में कुछ समय बाद मैं भी शिक्षक बन गया. उन्हीं दिनों की बात है मैंने एक दोस्त से कहा था “देखना एक दिन मैं लंदन में जाऊँगा”. पता नहीं मुझे इस नाम से ही कुछ आकर्षण सा महसूस होता था. लेकिन मुझे लग गया था कि यह वो जगह नहीं है जो मुझे अपने पैरों पर खड़ा कर सके सो उसको राम राम किया और दूसरी नौकरी की तलाश में चल पड़ा. इसी तरह नौकरी बदलते बदलते अभी वाली कम्पनी में काम मिला और फिर धीरे-धीरे समय बदल गया. इस पहली नौकरी से इस नौकरी के बीच में जो हुआ वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है. अगर उसे लिखने लगा तो एक बायोडाटा चिपकाने जैसी बात हो जायेगी. अब तक मैं तीन बार लंदन जा चुका हूँ. मुफ्त की नौकरी से शुरुआत करके आज ठीक ठाक जीवन गुजारने लायक हो चुका हूँ. एक भरा पूरा परिवार है.
–शेष कहानियाँ फिर कभी.
एक मौलिक पोस्ट
Sep 23rd
लोग एक दूसरे का नाम लेकर लिखते हैं. मैंने भी लिखा. अभी तक उसकी लीपा-पोती नहीं हुई है. शायद कालांतर में हो या कभी ना हो और लोग अपने अपने मन का मैल या तो दिल में संजो कर रख लें या किसी पोस्ट में उल्टी कर दें या वैसे ही भूल जायें, या यह भी हो सकता है कि कान पर जूँ ही न रेंगा हो. हो सकता है कि मारे ज्ञान और अनुभव के कारण बाल नहीं होंगे तो जूँएं भी नहीं होंगी.
उस पोस्ट पर से दो टिप्पणियों को मैंने डिलीट कर दिया क्योंकि वह मुझे बहस की मर्यादा से एकदम परे लगा. पर मैं उन सब लोगों से जिन्हें इससे कष्ट पहुँचा हो क्षमा माँगता हूँ, क्योंकि यह निश्चित है कि मेरा उद्देश्य कभी भी किसी को दुःख पहुँचाने का नहीं था.
इधर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जब सोच में मौलिकता का अभाव हो या मौलिक पोस्ट लिखने की क्षमता ही न हो या लेखक विषयाभाव से घबड़ा गया हो तो अकबका कर कुछ भी लिख जाता है.
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मैं सन २००६ में पहली बार लंदन गया था. शुरु शुरु में एक डिपार्टमेंटल स्टोर से तैयार खाना खरीदता था. एक दिन चावल और मुर्गी का शोरबा बना था. जब वह खाना मेरे लिये पैक कर रहा था तो मैंने उससे आग्रह किया “Put some more gravy”. उधर से जवाब आया “Say Please!”, मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर से कहा “Put some more gravy please.” उत्तर में सुनने को मिला “My pleasure!”. मेरे लिये यह एक प्राईमरी की छूटी हुई शिक्षा थी जिससे मैं शुद्धतः आंचलिक भाषायी स्कूल में पढ़ने के कारण वंचित रह गया था. बाद में सीखी तो अवश्य पर व्यवहार में नहीं ढाल पाया था.
इसी घटना को मैंने अपने एक मित्र को भी बताया तो उसे मेरी गलती नहीं दिखी वरन उसने गोरे-काले के इशू पर अपनी झल्लाहट प्रकट कर दिया. अमूमन हम ऐसा तब करते हैं जब किसी घटना के दोनों पहलूँओं को नहीं देख पाते या कहिये कि अपने या अपने प्रिय व्यक्ति की तरफ कोई भी नकारात्मक बात नहीं देख पाते.
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मेरी तरफ से एक फोटो. यह एक तरह की फोटोग्राफी होती है “Camera Toss”. इसमें Camera को क्लिक कर के हवा में उछाल दिया जाता है और फिर एक अजीब सी तस्वीर जो कि प्रक्रिया दुहरायी भी जाये तो वही तस्वीर नहीं बनती. ठीक उसी तरह जैसे उलूल जुलूक खयाल भी दुबारा उसी स्वरूप में नहीं आते. लोग इस को कला कहें या संयोग यह तो देखने वाले पर निर्भर करता है.
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मेरे पिता बहुत ही अनुशासन प्रिय व्यक्ति हैं. पर उम्र के साथ उनके अनुशासन के नियम बदलते रहे हैं. जो नियम मेरे लिये अकाट्य थे वही नियम मेरे बच्चों के लिये अनुपस्थित हैं. परिपेक्ष्य बदल गया है मैं उनकाअ कर्तव्य था पर मेरे बच्चे उनके लिये वात्सल्य प्रकट करने का अंतिम अवसर हैं. मुझे हमेशा सिखाया जाता था कि जिस चीज को जहाँ से उठाओ उसे वापस वहीं रखो. एक रात मेरे पिता ने तौलिया का प्रयोग करने के बाद अपनी मच्छरदानी के ऊपर रख दिया. सुबह मैं जब स्कूल जाने के लिये तैयार हो रहा था तो नहाने के बाद भींगे हुए उस तौलिये को वापस उनकी मच्छरदानी पर रख दिया. उसके बाद जो हुआ वह भारतीय बच्चों को बताने की जरूरत नहीं समझता. पर मैंने उसके बाद से उनके दिये किसी भी नियम का अक्षरशः पालन बंद कर दिया.
अनूप शुक्ल की हिंदी योग्यता क्या है?
Sep 19th
17 सितम्बर की चिट्ठाचर्चा अनूप शुक्ल ने की. चर्चा में उन्होंने कुछ प्रश्नों के उत्तर भी दिये. उनके उत्तर देने की देर थी की अपने चिरिन्नोसेन्ट समीर जी क्षमा माँगते नजर आये. उनके क्षमा माँगने की अदा इतनी प्यारी है कि जिससे क्षमा माँगें वही क्षमा का पात्र लगे. उन्होंने परमाणु विस्फोट के सही तरह न होने के लिये भी क्षमा माँगी है आशा है देश की जनता उन्हें इस बात के लिये अबश्य क्षमा कर देगी. वैसे उन्होंने यह भी दुहराया है कि अगली बार विस्फोट सही सही करवायेंगे. कहाँ, कब और क्यों की उत्सुकता आप उन्हीं से पूछ कर शांत करें.
फिलहाल रचना सिंह ने अनूप जी के हिंदी में की गयी चर्चा का जवाब लाईन-ब-लाईन पढ़ते हुए, दुहराते हुए अंग्रेजी में एक सवाल किया है.
can we PLEASE have your qualifications in hindi language and literature so that we know how qualiified are you ? to judge so many ILLITERATES blogging in hindi .
और क्रमश:
and it really is fine to say
आपकी किसी बात का जबाब मैं नहीं दे रहा because some questions on qualifications {to correct every blogger’s hindi , judge their works and pass comments on their calibre as you have done when comparing them with your favorite blogger } cant be answere as qualifications are always backed by documentory evidence .
self appointism to judge others “caliber” without any pre requiste qualification in hindi literature or language i can only say keep avoiding this question but one day YOU will have to answer it
सबसे पहले तो आपके उपर एक खिन्न भाव सा उत्पन्न हुआ पर यह सोच कर कि बहुत से लोग हिन्दी पढ़ सकते हैं पर लिखने में उन्हें असुविधा होती है सोच कर उसे परे कर दिया.
अब मेरी बात.
अनूप जी की हिन्दी योग्यता जानने की जरूरत आपको क्यों होगी इसमें मुझे कोई रुचि नहीं है. पर इतना पता है कि केवल डिग्रीयाँ किसी व्यक्ति को लिखने व बोलने की योग्यता प्रदान नहीं करती. यदि ऐसा होता तो आप जैसा कोई भी व्यक्ति् एक से एक पूजनीय साहित्यकारों से उनकी डिग्री माँगने लगे और उसका जवाब उस स्तर का कोई साहित्यकार क्या देगा यह अंदाजा तो आप लगा ही सकती हैं.
ऐसा ही कुछ अनूप जी के कोई जवाब न देने का कारण है.
रही बात आपके “self appointism to judge others” तो इसके बारे में इतना ही कहना होगा लोग उन्हें पढ़ते हैं, उनकी राय मानते हैं इसीलिये वे अपने सुझाव देते हैं. वे जो भी कहते हैं इस बात को दुहराते हुए कहते हैं कि यह उनकी राय है और उससे सहमत होना या न होना अगले पड़े पर निर्भर करता है. अब ब्लॉग्गिंग तो अपना अपना मत प्रकट करने का स्थान ही तो है. असहमति होने पर अपनी और अगले की औकात नापने का प्रयास करना आपको हास्यप्रद ही बनायेगा.
फुरसतिया पढ़ने से पहले पासवर्ड माँग रहे हैं
Sep 17th
लगता है hindini.com पर कोई समस्या चल रही है. पढ़ने की कोशिश करने पर नीचे दिया हुआ संदेश दिख रहा है. यही हालत ई-स्वामी जी की भी है. पूरी बात तो स्वयम फुरसतिया जी ही देवेंगे. अगर आप लोग देख पा रहे हैं तो मुझे भी बतायें.
Authorization Required
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Additionally, a 401 Authorization Required error was encountered while trying to use an ErrorDocument to handle the request.
“इंडिया” पुल्लिंग या स्त्रीलिंग? और “भारत”?
Sep 5th
थोड़ी दुविधा हो गयी है. राय चाहिये, आशा है मार्गदर्शन अवश्य मिलेगा.
हम कहते आये हैं “मेरा भारत महान“, फिर “भारत माता की जय“. मैंने कभी “मेरा माता” नहीं सुना. ना ही माता के नाम के साथ “मेरा” शब्द का प्रयोग देखा. यह तो दुविधा का कारण है. दरअसल में मेरी दुविधा तो है कि मैं “मेरा इंडिया” लिखूँ या “मेरी इंडिया”. यह प्रश्न इसलिये कि मेरे साईट का नाम है www.myIndiya.com.
यदि मेरा भारत और मेरा इंडिया सही है, तो यह समझ नहीं पा रहा कि कैसे?
क्षमा करें मैं वैयाकरण नहीं हूँ.


आपने कहा