एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
कवितायेँ
सुख का भरम
Jan 7th
हाँ कुछ अच्छा भी हुआ था आज
मैंने बिटिया को स्कूल छोरा
और बेटे के साथ की थोरी मस्ती
दफ्तर को निकलने से पहले बीवी को क्या प्यार
बहुत अच्छा लगा ये सब बहुत दिनों के बाद
अरे नही, हम एक कॉम से आते हैं
जो पुरा दिन काम में लगा देते हैं
और जमा करते हैं कुछ चर्बी अपने तन में
जो दिखाती है कि कितने कर्मठ होंगे हम
कसूर हमारा नहीं कि हम ऐसे हो गए
थे तो हम भी निठल्ले ही बचपन से
कि अचानक शौक चर्राया नौकरी का
और अमीरों की तरह जीने का
कुछ इस तरह अमीर होने लगे हम
कि चल नहीं सकता घर दो महीने
बिना माहवारी तनख्वाह और भत्ते के
हाँ मिला एक भरम कि हम सुखी हैं
शायद हम भी आज एक किसान होते
पर पुरखों को रास आया नहीं खेत
और हमें नहीं भायी गाँव की धूल
पुकार
Jan 7th
आज कल कुछ खास होता ही नहीं
और अगर होता भी है तो कुछ मौतें
और होती है कुछ गिनतियाँ और समीक्षाएं
मालूम नहीं कब तक यूँ मैं रोज मरता रहूँगा
किसी आतंकी, किसी अपराधी, किसी नेता के हाथों
कोई बचाए ऐसा तो कोई दीखता ही नहीं
एक ही बार में मार डाले ऐसा कोई दिखे तो कहना
हम तुम
Jan 5th
सुबह तो कल भी हुई थी और आज भी
पर बदले हुए ते हमारे आज मिजाज भी
कल करवाहट चाय की हुआ करती थी
पर आज करवे थे हमारे जवाब ही
यह पहली बार ही हुआ है आज कल में
बस हमी को लग रहा है एक जमाना हुआ
एक पल तो गुजरता नही है दूर हम से
और हम झगरते हैं जैसे मजबूर नही
मेरी तो पुरानी आदत है आवारगी की
तुम यूँ ही शराफत सिखाये जाती हो
जैसे बदल पकड़ के छुपा लोगी तुम
और वो चिपका रहेगा तुम्हारे सीने से
मालूम है मुझे घबराना तुम्हारी आदत है
तुम ही भूल जाती है मैं कोई आम नही
हमने शर्तों पर चलने कि कसम नही खाई थी
फिर अब क्यों पकड़ रक्खा है जैसे बुलबुला

आपने कहा