एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
कवितायेँ
दुनिया का दुःख
May 20th
अपनी खुशी पर हम खुश हुए कम
औरों के ग़मों ने जी बहला दिया.
दुःख तो अपने दामन में थे बहुत कम
औरों के सुख ने ही जी जला दिया.
पुकार
Apr 23rd
त्याग कर अभिमान अपना
रख धरा का मान ले तू
पाया बहुत कुछ अभी तक
अब दान की भी ठान ले तू
जी चुका बहुत अभी तक
निज, सखा, संतान खातिर.
मान ले तू, धर्म तेरा
है निज नहीं, संसार-सेवा.
जो जिया है व्यर्थ अभी तक
हो गयी हो क्षीण शक्ति.
माना यह अंतिम प्रहर है
फिर भी जननी बाट जोहती.
न सोच इतना, चल चला चल
देख है अब साथ कितना.
समीप जीवन का अस्ताचल
क्यों रोकता तू हाथ अपना.
चाह तेरी भी है मानव
जाति तुझको याद रक्खे.
एकांत में मृत्यु वर कर
क्यों तुझे कोई याद रक्खे.
है नहीं कोई पुकार यह
जो मांगता तेरा धन अपार है.
मांगता है अंश अवयव
तेरे अनुभवों का समाज है.
अब समय है दान दे तू
और नहीं कुछ, ज्ञान दे तू.
दीन हीन निश्छल पड़े हैं
पशु सदृश तेरे सहोदर.
देख, ठगना उनको सहज है.
सुन, मर्दन उनका महज है.
बता, क्या यह देखना भी
तुझको उतना ही सहज है?
यह उन लोगों के लिए है जो जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर अपने उतरार्द्ध में भी समाज सेवा से इसलिए डरते हैं कि कहीं उनके सम्मान या अभिमान को ठेस न पहुंचे. चाहते हैं कि समाज बदले, पर अंहकार आगे आता है. जो दीन है, जो गरीब है उसका तो मात्र अंहकार ही सहारा है, वह अपने को समझा लेता है “गरीब हैं तो क्या हुआ, अपने मन की तो कर ली”. पर आप जो प्रबुद्ध हैं कैसे देख सकते हैं अन्याय होते हुए, उन्हें पशु की तरह जीते हुए. इस सन्दर्भ में एक आलेख लिखा था, समय हो तो उसे भी पढें.
जानकी! कतए छी? आउ नैहर
Apr 21st
जानकी! कतए छी? आउ नैहर.
देखू ने धिया पुता सब पैघ भय गेल.
किछ तऽ नेतो बनल अछि.
पैघ कुर्सी पर चढ़ल अछि.
वचन दऽ कय जाए कोना
दृग आ मुंह मोरि लेने अछि.
जानकी! कतए छी? आउ नैहर.
आउ बुझबियौक ओकरो कने
कोना राम राज्य चलै छल. More >
जिज्ञासा: एक मनुज धर्म
Apr 21st
भूल हो जाती है
ललक पड़ता है ये मन
जब उत्सुकता खींच लाती
चेतना से बचपन में.
क्या करुँ मैं अज्ञान.
रहता नहीं परिपक्व चिंतन
जो हुआ प्रसन्न कभी.
छूट जाते होश मेरे
है फिर वही एक चूक होता.
एक चूक!
डरा देती चित्त चपल को.
जैसे साईकिल से नवयुवक
को गिरा देती सड़क है.
डर समा जाता है ऐसे,
बुरबुराता मन है कोई
जैसे बालक का सिहर कर.
फिर चेतनता खींच लाती
सिखाती व्यवहार मुझको.
आप तो ठहरे महान!
एक बालक सा अड़ा मैं.
नहीं मानता अपराधबोध
तोड़ कर ज्यों फूलदान.
मन आपका, पीड़ आपकी,
सही गलत तहरीर आपकी
मान करुँ जो न अकर्म.
तो कहो कैसे निभाऊं
मैं मूढ़मति निज मनुज धर्म.
मेरा भारत महान?
Apr 16th
मेरा बाप मर गया
उस के नाम पर दे दो भाई
उसकी माँ भी मर गयी साहब
उस के नाम पर तो दे दो भाई
मेरे बाप का नाना बड़ा सयाना
उसके नाम पर तो दे दो भाई
अल्लाह के नाम पर दे दो भाई
राम के नाम पर दे दो भाई
ईशा के नाम पर ही दे दे भाई
वाहे गुरु दा खालसा, वाहे गुरु दी फतह
अब तो तुम दे दो भाई.
भिखारी लोग घबरा गए,
इधर उधर भागने लगे,
चिल्लाने लगे, चारो तरफ चिल्ल-पों .
फिर एक आवाज आयी
ये तो हमारे नारे थे
तुम अपनी वाली लगाओ ना.
पब्लिक खड़ी सोचती रही
ये अपने नाम पर कब मांगेंगे.
पुलिस भी खड़ी सोचती रही
इनके आगे-पीछे हम क्यूँ भागेंगे.
जनता परेशान और हलकान
वोट दे कर छुड़ाई जान.
नेपथ्य से आवाज आयी
कब तक दिलासा दोगे खुद को
कह के “मेरा भारत महान” ?

आपने कहा