आज अख़बार में पढ़ा की एक आदमी को ऑस्ट्रेलिया ने नौकरी से इस लिए निकाल दिया की वो शौचालय में पानी का प्रयोग करता था. यह सन्दर्भ मात्र है. मैं लन्दन गया हूँ और वहां शौचालय में पानी का प्रबंध ही नही मिला. अब मैं यह तो नही जनता कि पानी का प्रबंध था परन्तु प्रयोग की मनाही थी या वह व्यक्ति अपने घर से लोटा…इस्स्स गलती हो गयी, बोतल ले कर आया था या किसी और माध्यम से जैसे कि काफ़ी का मग बगैरह वगैरह ले गया था.
अब मुझे चिंता हो रही है तथाकथित धर्म के पहरेदारों की. क्या वे अपने बच्चों को सिक्षा या नौकरी या व्यवसाय के लिए विदेश जानते देते हैं? आज भी हमारे यहाँ हमारी माता घर में कुछ भी नही छूने देंगी अगर उन्हें पता चले कि अमुक व्यक्ति शौचालय के बाद जल का प्रयोग नही करता.
फिर ख्याल आया मंगलोर घटना का, वैसे तो अपने यहाँ यह सब चलता ही रहता है. ऐसे बहुत सरे दिग्गज हैं हमारे यहाँ जो “मुक्खे कानून छ” में विस्वास रखते हैं और उनका कानून चलता भी है. चाहे हमारे नेता कितना ढोल पीट ले कि कोई भी कानून से ऊपर नही है. अरे मन ऊपर न सही बराबरी तो करता है ना.
इसी कड़ी में यह भी याद आता है कि इन्द्र देव की सभा में अप्सराएँ नाच रही होती थी और देव सुरा का पान करते थे. मैं इस बहस में तो नही पड़ता कि वो कैसे क्या करते थे और यह कितना प्रमाणित है कि वो ऐसा कुछ करते भी थे या नही. परन्तु हमें बचपन से ले कर आज तक जब भी स्वर्ग के किस्से सुने इन्द्र का नाम सुना और जब इन्द्र का नाम सुना तो अप्सराएँ और सुरा का नाम अवश्य सुना. यदि आज के समय में इन्द्र यहाँ होते तो क्या उन्हें पब्लिक वैसे ही नही पीट देती जैसे कि मंगलौर में लड़कों को पीटा गया? क्या लोग अप्सराओं पर भी हाथ उठा देते?
धर्म और संस्कृति की रक्षा जबरन नही हो सकती. लिबास या जीने के तरीकों से संस्कृति को कोई फर्क नही पड़ता. जब हमारे पूर्वज धोती में थे या उसके बिना भी रहे हों तब भी उन्होंने विकास किया, धर्म और संस्कृति को बनाया, संवारा और हमें विरासत में दिया. हमारे पिता की पीढी जो खानदान में पहली पायजामा पहनने वाली पीढी थी ने हमें सिखाया कि औरतों को सम्मान दो, अपने धर्म को जानो, बड़ों और अजनबियों से आदर से बात करो. वगैरह वगैरह.
धर्म और संस्कृति का पतन तब होता है हमें उनकी जरूरत समझ में नही आती. और जिन्हें आज जरूरत समझ में नही आती ऐसा नही है कि उन्हें हमेशा ऐसा ही महसूस होगा. जीवन के हर पड़ाव पर जरूरत अलग अलग होती है. आज की पीढी अपने आप को राजकुमारों की तरह रखती है. और जब उनका जोश ठंडा पड़ता है तो वे भी धर्म, संस्कृति, समाज की तरफ़ देखेंगे. और यदि नही भी देखते तो यह कहाँ का न्याय है कि हम दूसरों से वही अपेक्षा करें जो हमें अच्छा लगता है?
हम जितनी शक्ति इन बातों में लगाते हैं उतनी शक्ति हम सरकार को सही तरह से काम करने पर मजबूर करने में लगायें तो शायद सब का भला हो.