सुबह तो कल भी हुई थी और आज भी

पर बदले हुए ते हमारे आज मिजाज भी

कल करवाहट चाय की हुआ करती थी

पर आज करवे थे हमारे जवाब ही

 

यह पहली बार ही हुआ है आज कल में

बस हमी को लग रहा है एक जमाना हुआ

एक पल तो गुजरता नही है दूर हम से

और हम झगरते हैं जैसे मजबूर नही

 

मेरी तो पुरानी आदत है आवारगी की

तुम यूँ ही शराफत सिखाये जाती हो

जैसे बदल पकड़ के छुपा लोगी तुम

और वो चिपका रहेगा तुम्हारे सीने से

 

मालूम है मुझे घबराना तुम्हारी आदत है

तुम ही भूल जाती है मैं कोई आम नही

हमने शर्तों पर चलने कि कसम नही खाई थी

फिर अब क्यों पकड़ रक्खा है जैसे बुलबुला