परिचर्चा

एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

ठक-ठक महाकाव्य

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मेरे एक भ्राता हैं, अंगरेजी में कजिन कह लीजिये. बहुत ही बेबाक व्यक्ति हैं. उनके पितामह जो मेरे पितामह के सहोदर भी थे, मैथिली में बहुत ही सम्मानित लेखक व कवि रहे हैं. साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित भी हुए. उनकी एक कविता मेरे इन भ्राता को समझ में नहीं आयी और इसी बात पर घर में ही आलोचना शुरू हुई.

आलोचना यह थी की कवितायेँ ऐसी होनी चाहिए कि पढने वाले को सीधे समझ में आ जाये. दूसरी तरफ से हम दोनों के चाचा जी व स्वर्गीय पितामह के ज्येष्ठ पुत्र ने तर्क दिया कि कविता ऐसी होनी चाहिए जिसमे कोई गूढ़ अर्थ छिपा हो.

प्रत्युत्तर में तर्क, या कुतर्क जो भी कहिये, यह था कि यदि इसी को कविता कहते हैं तो वह एक महाकाव्य लिख सकते हैं जिस में सैकडों बाद सिर्फ ठक ठक लिखा होगा.  पढने वाला उनका अर्थ लगाते रहे जैसे भ्रष्टाचार पर प्रहार “ठक-ठक”, दहेज़ प्रथा पर प्रहार “ठक-ठक”. इसी तरह से वो जो भी अर्थ निकाल सके.
 
अभी अभी काल कविता पढी तो उस ठक-ठक महाकाव्य की याद आ गयी.

भरोसा

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आज बहुत तकलीफ हो रही है,  बहुत दिनों से एक सपना देखता था कि अपना एक घर बनाऊँगा. पर फ्लैट नहीं में नहीं बसूँगा. मैं कभी भी कबूतरों की तरह नहीं रहना चाहता. पर जितनी बाद कदम बढ़ता हूँ एक डर पाँव पीछे खींच लेती है. बेबस सा महसूस होता है और तकलीफ होती है यह सोच कर कि हमारा मुल्क ऐसा क्यों है?

आर्थिक रूप से इतना सक्षम हूँ कि मैं यहाँ एक छोटा सा घर बना सकता हूँ, जिसमे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रह सकता हूँ, पर डर लगता है. मैं जहाँ रहता हूँ, आये दिन किसी के यहाँ ताला टूटने की, किसी अधेड़ या किसी अकेली महिला की किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा हत्या की खबर अखबार में आती रहती है. हर अनजान चेहरे से डर लगता है, और जाने पहचानों से भी दूरी बना कर रखनी पड़ती है. पत्नी और बच्चों को हिदयात दे रखी है कि चाहे जो भी हो, जब मैं या गार्ड घर पर नहीं हैं तो किसी के लिए भी दरवाजा मत खोलो.

क्यों हमें डर लगता है भीड़ में भी और भीड़ से बाहर भी? मैं कहाँ जाऊं? कोई मुझे ऐसी जगह बता दो हिन्दुस्तान में जहाँ मुझे इंसानों का डर न हो.

फिर भी अभी मेरा सपना बाकी है, एक बार दिल ने भरोसा दिला दिया कि अमुक जगह पर रहा जा सकता है तो कोशिश जरूर करूंगा. तब तक कुछ इस तरह सोचता हूँ….

अभी हिम्मत नहीं टूटी है मेरे दोस्त
कुछ तो अच्छे लोग होंगे जहान में
हम यही सोच कर घर बना लेंगे कि
रहते हैं वही लोग बगल के मकान में…

तोता मैना

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कल तोता मैना गए बाजार
दोनों के हो गए आँखे चार
बीच सड़क पर कौआ देख
भागे जान बचा के यार

दरअसल वह कौआ कहता
क्यों मैना संग तोता रहता
भेज तोते को उसके परिवार
मैना को मारो थप्पर चार

कौए की चिंता है अतिभारी
कि करोगे कैसे इनमे भेद
जो यह दोनों व्याह रचा लें
और रंग बिरंगे अंडे जन्मा लें

मैना का बापू है कमजोर
कर न पायेगा वह हथजोड़
यही सोच कर मैना भोली
कौआ देख के सीधी हो ली

यह तोता है नेता का बेटा
बाप बहुत भाषण है देता
उसका हो जायेगा बंटाधार
किया जो किसी ने अत्याचार

बाज हुआ करता है राजा
पर उसको भी है लालच एक
शिकार औरों से है करवानी
सो कौआ करता मनमानी

सपनो का फ्लैट

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हम मध्यमवर्गीय थलचरों को
अवश्य चाहिए ईटों का घर
परन्तु जहाँ जीते हैं हम,
वहां न मिलती पब्लिक को घर

साकार करे जो सपना मेरा
मिलती है कुछ ऐसी दीवारें
जिनकी किस्तें भरने में ही
माथे पर उभर आए दरारें

यदि अगर कभी कुछ ऐसा होता
मुझ जैसों की विनती सुन कपीश्वर
ले जाते इन कम्पनियों को गाँव
मेरे सर भी होता अपने घर की छाँव

मारुती तो बिसरे थे कब के
अब तो बिसर गए अपने बंधू.
ख़ुद आते हैं साल पॉँच में घर
जो हर बार बढ़ा कर थोरा उदर.

अब जैसे तैसे मेरे जैसे लोग
लगें हैं लेने एक सपनो का फ्लैट
कि बच सके मासिक कटने वाले 
में से थोड़ा इनकम टैक्स.

जो बचेगा टैक्स तो दे पाएंगे
बच्चों के स्कूल में कुछ दान
ताकि बना सके वह भी ख़ुद ही 
हम जैसों की दुनिया में पहचान.

आप भी मुस्कुरा देंगे

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अखबार पढ़ती हुई कांक्षा

अखबार पढ़ती हुई कांक्षा

और उसकी ट्राईसाइकिल चलते हुए कांक्षा के पितामह

और उसकी ट्राईसाइकिल चलते हुए कांक्षा के पितामह

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