मेरे एक भ्राता हैं, अंगरेजी में कजिन कह लीजिये. बहुत ही बेबाक व्यक्ति हैं. उनके पितामह जो मेरे पितामह के सहोदर भी थे, मैथिली में बहुत ही सम्मानित लेखक व कवि रहे हैं. साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित भी हुए. उनकी एक कविता मेरे इन भ्राता को समझ में नहीं आयी और इसी बात पर [...]
Archive for February, 2009
आज बहुत तकलीफ हो रही है, बहुत दिनों से एक सपना देखता था कि अपना एक घर बनाऊँगा. पर फ्लैट नहीं में नहीं बसूँगा. मैं कभी भी कबूतरों की तरह नहीं रहना चाहता. पर जितनी बाद कदम बढ़ता हूँ एक डर पाँव पीछे खींच लेती है. बेबस सा महसूस होता है और तकलीफ होती है [...]
कल तोता मैना गए बाजार
दोनों के हो गए आँखे चार
बीच सड़क पर कौआ देख
भागे जान बचा के यार
दरअसल वह कौआ कहता
क्यों मैना संग तोता रहता
भेज तोते को उसके परिवार
मैना को मारो थप्पर चार
कौए की चिंता है अतिभारी
कि करोगे कैसे इनमे भेद
जो यह दोनों व्याह रचा लें
और रंग बिरंगे अंडे जन्मा लें
मैना का बापू है कमजोर
कर [...]
हम मध्यमवर्गीय थलचरों को
अवश्य चाहिए ईटों का घर
परन्तु जहाँ जीते हैं हम,
वहां न मिलती पब्लिक को घर
साकार करे जो सपना मेरा
मिलती है कुछ ऐसी दीवारें
जिनकी किस्तें भरने में ही
माथे पर उभर आए दरारें
यदि अगर कभी कुछ ऐसा होता
मुझ जैसों की विनती सुन कपीश्वर
ले जाते इन कम्पनियों को गाँव
मेरे सर भी होता अपने घर की छाँव
मारुती [...]


