मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: तुमने सुना?
जमूरा: क्या उस्ताद?
मदारी: चुनाव होने वाला है.
जमूरा: हाँ उस्ताद, मैं भी खड़ा हूँ.
मदारी: मजाक मत कर.
जमूरा: वो तो पब्लिक से करूंगा.
मदारी: क्या सोच कर खड़ा हुआ?
जमूरा: प्रधानमंत्री बनना है.
मदारी: औकात में रह.
जमूरा: उस्ताद, एक बात बोलूँ?
मदारी: बोल.
जमूरा: एक प्रधानमंत्री जमूरा बन गया तो एक जमूरा प्रधानमंत्री क्यों न बने?
मदारी: खेल [...]
Archive for March, 2009
दिल्ली हिंदुस्तान का दिल है
बड़ा ही मजबूत और सुन्दर
करोडों को खुद में समाये हुए
पूरे वतन का बोझ उठाये हुए
एक दिल करता है खून से विष की सफाई
पर इस दिल की है ऐसी शामत आयी
पूरे शरीर से आये हुए विष
अब तो ह्रदय में ही बसना चाहते हैं
और चाहते हैं दिलो-दिमाग पर राज
उस पर बाकी पीड़ित अंग
भर [...]
अवकाश से लौटते हुए
एक हमसफ़र बच्चे से पूछा
मुझे भी अपने साथ ले चलोगे
मैं तुम्हारे साथ
तुम्हारे कमरे में ही रह लूँगा.
मुस्कुराया
सोचा
और कहा
हमारे यहाँ खाने की मेज के साथ तीन ही कुर्सियां हैं
इतनी भाषाएँ, इतने प्रान्त
कुछ गरीब और कुछ संभ्रांत
देखो हैं ये कितने अशांत
मेरे दिन और उसके रात
मिले जब दोनों साथ
करते थे कुछ ऐसी बात
हो नहीं सकता भला इनका
जब तक न चलें
ये ले हाथों में हाथ
नहीं मिलेगी सुकून तुम्हे
कितने अजाँ ही कर लो तुम
और रगड़ लो टीके माथ
मैंने देखा है लोगों को महिला-पुरुष की बराबरी की वकालत करते हुए. और कई बार बेवकूफाना सवाल यह होता है कि जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया तो आप कौन होते हैं फर्क करने वाले.
मैं कहता हूँ आप अंधे हैं, बेवकूफ हैं, या कभी दोनों को एक साथ नहीं देखा? “जब बनाने वाले ने [...]


