परिचर्चा

एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

मदारी

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मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: तुमने सुना?
जमूरा: क्या उस्ताद?
मदारी: चुनाव होने वाला है.
जमूरा: हाँ उस्ताद, मैं भी खड़ा हूँ.
मदारी: मजाक मत कर.
जमूरा: वो तो पब्लिक से करूंगा.
मदारी: क्या सोच कर खड़ा हुआ?
जमूरा: प्रधानमंत्री बनना है.
मदारी: औकात में रह.
जमूरा: उस्ताद, एक बात बोलूँ?
मदारी: बोल.
जमूरा: एक प्रधानमंत्री जमूरा बन गया तो एक जमूरा प्रधानमंत्री क्यों न बने?
मदारी: खेल ख़त्म हुआ पैसे मांग.
जमूरा: नहीं मिलता है उस्ताद अभी रिसेस्सन है
मदारी: स्विस बैंक से मांग
जमूरा: पच्चीस लाख करोड़ तो अपने हैं, वही न उठा कर दे दें.

दिल

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दिल्ली हिंदुस्तान का दिल है
बड़ा ही मजबूत और सुन्दर
करोडों को खुद में समाये हुए
पूरे वतन  का बोझ उठाये हुए

एक दिल करता है खून से विष की सफाई
पर इस दिल की है ऐसी शामत आयी
पूरे शरीर से आये हुए विष
अब तो ह्रदय में ही बसना चाहते हैं
और चाहते हैं दिलो-दिमाग पर राज

उस पर बाकी पीड़ित अंग
भर रहे हैं बस इतनी ही आहें
कि ये विष दिल में या कहीं और चले जाएँ
परिष्कृत हों न हों, पर वापस न आयें

सुना है तंत्र को मौका मिलेगा
चुनने को खून और विष में अपनी पसंद
पर क्या करे यह जड़ तंत्र
जब कोशिकाओं में ही नहीं उमंग

दिल भी क्या करे
उसकी भी एक क्षमता है
उसे खून में से विष अलग करना है
पर कैसे निकले विष से खून

विष को ही चुनता है
और निराश पड़ा देखता है
थोड़ा बहुत बचा खून भी
धीरे धीरे हो रहा है नीला

अभी अभी जाने वाला योगी
लौट कर आ जायेगा
ऐसी एक आस भी है
चाहे यह देह न हिले न डुले
आशा है जब तक आख़िरी सांस भी है

चतुर

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अवकाश से लौटते हुए
एक हमसफ़र बच्चे से पूछा
मुझे भी अपने साथ ले चलोगे
मैं तुम्हारे साथ
तुम्हारे कमरे में ही रह लूँगा.
मुस्कुराया
सोचा
और कहा
हमारे यहाँ खाने की मेज के साथ तीन ही कुर्सियां हैं

मिल के रहिये

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इतनी भाषाएँ, इतने प्रान्त
कुछ गरीब और कुछ संभ्रांत
देखो हैं ये कितने अशांत

मेरे दिन और उसके रात
मिले जब दोनों साथ
करते थे कुछ ऐसी बात

हो नहीं सकता भला इनका
जब तक न चलें
ये ले हाथों में हाथ

नहीं मिलेगी सुकून तुम्हे
कितने अजाँ ही कर लो तुम
और रगड़ लो टीके माथ

महिला-पुरुष की बराबरी और थोथी दलीलें

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मैंने देखा है लोगों को महिला-पुरुष की बराबरी की वकालत करते हुए. और कई बार बेवकूफाना सवाल यह होता है कि जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया तो आप कौन होते हैं फर्क करने वाले.

मैं कहता हूँ आप अंधे हैं, बेवकूफ हैं, या कभी दोनों को एक साथ नहीं देखा? “जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया”. अच्छा? यह तो मुझे पता ही न था की महिला और पुरुष की शारीरिक बनावट एक सी होती है. आपने मुझे गधा समझ कर एक दलील दे डाली और मैंने सुन भी लिया. मेरे जैसे और अहमक भाई लोग भी हैं सो आपकी जीत भी हो गयी.

परन्तु मुझे सिर्फ इतना बता दें, कि आपकी किस आँख से महिला-पुरुष में शारीरिक फर्क नहीं दिखता. यदि दिखता है तो यह न कहिये कि बनाने वाले ने फर्क नहीं किया. मुझे तो दोनों के शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर फर्क दिखता है. मैं मानता हूँ कि दोनों में फर्क है और दोनों के कर्त्तव्य और अधिकार क्षेत्र अलग होने चाहिए. सीधी सी बात है अगर मेरे और मेरी पत्नी के ऊपर कोई लाठी लिए दौरा आ रहा हो और यदि मैं अपनी पत्नी के भरोसे लाठी न उठाऊँ तो दोनों की हत्या होने में देर न लगेगी, सो मुझे लाठी उठाने का कर्त्तव्य और अधिकार दोनों स्वयमेव मिल गए. और इस परिस्तिथिजनित अधिकारों और कर्तव्यों का सम्मान होना चाहिए. जो थोथी दलील देने वाले कदापि नहीं सोचते.

मैं सीधे सपाट शब्दों में महिलाओं के लिए संपत्ति और शिक्षा जैसे अधिकारों में बराबरी का हक़ मानता और मांगता हूँ परन्तु उनके कर्तव्यों और कार्य क्षेत्रों पर मैं बराबरी का विरोध करता हूँ. मैं यह भी मानता हूँ कि उनके कर्त्तव्य जीवन के उन क्षेत्रों में ज्यादा होनी चाहिए जहाँ भावनाओं को समझने की जरूरत है. रोजगार सम्बन्ध में भी मैं किसी महिला को सीमा पर बन्दूक ले कर भेज देने के खिलाफ हूँ, वहीं शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में उनका महत्व बढा हुआ देखता हूँ.

मैं बात को ज्यादा न खीचूँगा पर सारांश में यह कहना चाहता हूँ कि महिला और पुरुष दोनों अलग हैं और उनके अधिकार और कर्त्तव्य अलग होने चाहियें. हरेक क्षेत्र में गडद-मड्ड करने से समाज का फायदा के बजाय नुकसान हो जायेगा.

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