एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for March 5, 2009
गुलेल बनाऊँगा और चिडिया मारूंगा
Mar 5th
बचपन में हर बच्चे को लोग पूछते रहते हैं कि वह बड़ा हो कर क्या करेगा. ऐसा ही एक लड़का था जो इस प्रश्न का उत्तर हर बार एक ही देता था “बड़ा हो कर गुलेल बनूंगा और चिडिया मारूंगा”. शुरू शुरू में तो उसके माता पिता ने बच्चे की नादानी या मश्खारी समझ कर ताल दिया, परन्तु जब बच्चा सब कुछ समझने बूझने लायक हो गया तो भी उसका यह उत्तर न बदला.
परेशान हो माँ बाप ने हर तरफ मदद की गुहार लगाई और अखिरतः उन्हें एक मनोवैज्ञानिक का पता मिला जो ऐसे बच्चों को सही रस्ते पर सोचना सिखाता था. बच्चे को उस मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया, तो सलाह दी गयी कि उसे कुछ हफ्ते वहीं छोड़ दिया जाये. तथास्तु “हारे को हरिनाम” वाली हालत में माँ बाप बच्चे को वहीं छोड़ आये.
जब बच्चा वापस लौटा तो कुछ समय तक किसी ने कुछ नहीं पूछा परन्तु माँ बाप ने उत्सुकतावश उससे पूछ ही डाला कि “बेटा बड़े हो कर क्या करोगे?”
बेटे ने इत्मीनान से जवाब दिया:
“पहले तो मैं बहुत ही मन लगा कर पढूंगा और इस लायक बनूँगा कि विदेशों में एक बड़ी सी नौकरी मिले. बहुत काम और नाम करूंगा, पैसे भी बचूंगा और जब ढेर सारा पैसा होगा तो वापस आऊँगा शादी करने. शादी में दहेज़ भी लूँगा. दहेज़ में सब कुछ लूँगा, घर, पैसा, गहने, कपडे यहाँ तक कि अंडरवियर भी. और जब वो अंडरवियर पुराने हो जायेंगे तो उनके रबर से गुलेल बनूँगा और चिडिया मारूंगा”.
आना है आपको टॉप के ५० में – चरण १
Mar 5th
लेखक, गंजेरी और गुंडे गैंग में ही बड़े होते हैं. जितना सॉलिड गैंग उतना ज्यादा विकास. तो कहने का मतलब यह कि गैंग में पहले चमचागिरी कर के घुसिए फिर अपना पाँव फैलाइए, फिर कद बढाइये. पर यह जरूरी है कि आप और हम यह गौर करें कि पेशे में सठियाये हुए ये ब्लोग्गेर्स के गुण क्या हैं. उनकी लेखिनी की धार और उपजाऊ दिमाग के विचारों पर गौर कीजिये. मैं यह नहीं कहता कि हम और आप उनके विचार या लेखन शैली की नक़ल करें, क्योंकि इस से मौलिकता चली जायेगी. फिर जब हम भी (अगर क्षमता है तो) उनके स्तर के लेखक या कवि होंगे तो वाहवाही या आलोचना मिलना स्वाभाविक है.
तो सबसे पहला चरण यह है कि उनके गैंग में घुसिए, और घुसने का एक ही तरीका है जम के टिपियायें. और दूसरा कि जम के लिखें ताकि वो शर्म के मारे ही सही आपको भी टिपियायें. और जब बड़े लोग टिपियायेंगे तो हम जैसे छुटभैये तो अपने आप ही चले आवेंगे. यदि आप गौर से टिप्पणीकार का नाम हर ब्लॉग पर देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर नाम बार बार आते हैं. मतलब? वे आपस में एक दुसरे के ब्लॉग को टिपयाते रहते हैं. है न गैंग?
मैंने हाल ही में ब्लॉग्गिंग शुरू किया है, और आप लोगों की कृपा से प्रतिक्रियाएं अच्छी मिली हैं. आशा है आपको भी सफलता मिले.
आप सब को धन्यवाद् और शुभकामनायें.
वो अकेली नहीं है
Mar 5th
जिस अपार्टमेन्ट में मैं रहता हूँ उसका गार्ड आज बदल गया. वास्तव में उसने अपने पेशा बदल लिया. वह अपार्टमेन्ट के गार्ड रूम में अपनी पत्नी और ७ साल की एक बेटी के साथ रहता था. मेरा बेटा भी तकरीबन ५ साल का है कुछ और भी बच्चे हैं जो सभी लगभग ७ साल से कम ही होंगे. सो सब पुरी तरह घुल-मिल गए थे. गार्ड की बेटी का नाम मैं नहीं बताना चाहता सो चलिए उसे कोयल बुलाते हैं. मेरी २ साल की बेटी इन सब में सबसे छोटी है और वह सबको चाहती है. उसके जाने के बाद से मेरी बेटी कई बार दुहरा चुकी है कि कोयल चली गयी. उसका किसी दोस्त बिछड़ने का यह पहला अनुभव है.
इन सब में कोयल मुझे थोड़ी अलग लगती थी, अपने हाव-भाव व बोलने, उठने बैठने के तरीके वगैरह सब में बाकी बच्चों से अलग थी वह. इसके बारे में विस्तार से आगे बता सकूंगा.
मेरे घर में बच्चा चाहे कोई भी हो, एंट्री, खाना-पीना और शोर-शराबा की उन्हें पुरी छूट होती है. जो कुछ भी खाना हो मांग लो, कोई खिलौना चाहिए तो उठा लो वगैरह-वगैरह. अगर मैं या मेरी पत्नी कुछ पका रहे हैं तो पाक रहा व्यंजन जिन बच्चों को पसंद होगा वे किचेन में ही घूमते नजर आएंगे.
इसकी एक वजह यह होती है कि मेरे बच्चे बाकी बच्चों के साथ घुलना मिलना सीखते हैं और साथ ही बाकी बच्चों को खेलने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ता. यही सब सोच कर मैंने घर में फर्निचर भी नहीं लगवाया है.
अब कोयल की समस्या यह है कि उसकी माँ को किसी का खाना देना वगैरह अच्छा नहीं लगता. वह एक स्वाभिमानी औरत थी. पर मुझे जो एक चीज खटकती थी और जिस से मैं चिढ़ने भी लगा था (भगवन मुझे माफ़ करें) कि कोयल कभी भी कुछ मांगती नहीं थी, वह खाने पीने की चीजें बाकी बच्चों की प्लेटों से उठा लेती थी (वह भी कुछ ठगने जैसा). उसको मिठाइयां बहुत पसंद थीं. वह खेलने भी खाने पीने के समय आती थी.
मुझे उसका मेरे यहाँ खाना कभी बुरा नहीं लगा, पर तकलीफ इस बात की होती थी कि एक सात साल की बच्ची जिसका माता-पिता दोनों काम करते हैं, और यदि मेरी पत्नी की गणना सही है तो लगभग बंगलोर जैसे शहर में बिना किराया या बिजली बिल दिए हुए दोनों मिल कर साथ आठ हजार कम लेते थे, थोरे से अंगूर या कुछ समोसे या कुछ मिठाइयों के लिए तरसती रहती थी. यह भी बतला दूं कि उन दोनों के यह एक ही बच्ची थी और उनके कोई और बच्चा नहीं हो सकता (यह डॉक्टरों ने तस्दीक़ कर दिया है).
मुझे यह कभी भी समझ में नहीं आया कि उस नन्ही सी जान के छोटे छोटे अरमान उसके माँ बाप क्यों नहीं पूरा करते? क्या वह बेटी है इसलिए? या उसे बिगाड़ना नहीं चाहते इसलिए? या वे पैसे बचाया करते थे? नहीं, मुझे समझ में नहीं आता कि वे क्या करते थे ना ही मुझे इस बात को समझना इतना जरूरी लगता है.
मेरी तकलीफ यह है कि कोयल यदि कुछ और बरस हमारे यहाँ आती जाती रहती तो क्या उसे नहीं याद आता उसका खाने के पीछे इस तरह का व्यवहार? यदि उसे याद आता तो वह कैसा महसूस करती? जहाँ तक मुझे समझ में आता है यह उसका आत्म-सम्मान छीन लेता. और कहीं न कहीं मैं उसके इस दुःख का कारण होता. कोई भी व्यक्ति अपने अन्दर के इन छोटे छोटे बोझ के तले इतना न दब जाये कि वह सर ही न उठा सके.
भगवन उसे एक सुखद और सम्मानित जीवन प्रदान करें. आप भी कोयल और उसे जैसे बच्चों के भले के लिए प्रार्थना करें.
अच्छा तालीबान -बुरा तालीबान
Mar 5th
सुना है पाकिस्तान सरकार ने तालिबानियों का वर्गीकरण किया है, अच्छा तालीबान और बुरा तालीबान. टाईम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा है मस्ट बी जोकिंग. नहीं वह मजाक नहीं कर रहे, उनका अच्छे तालीबान का मतलब उन तालिबानियों से है जो सरकार के इशारे पर चलते हैं और बुरे तालिबानियों का अर्थ कि वह अब उन्हें काबू नहीं कर पा रहे हैं.
स्तिथि जितनी गंभीर दिखती है, वास्तव में उस से कई गुना ज्यादा गंभीर और भयावह है. आप इस बात का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि जब छानबीन ठीक से शुरू भी नहीं हुई थी कुछ पाकिस्तानी नेताओं और अधिकारीयों ने हथियारों के भारत में निर्मित होने की बात कह दी.
मैं इस बात से ज्यादा चिंतित नहीं हूँ कि वे भारत से बदले का मौका ढूंढ रहे थे या अंदरूनी कमजोरियों को ढकने की कोशिश. भयावह यह है कि किस तरह ये नेतागण और अधिकारीगण स्तिथि से मुँह मोड़ कर लोगों का ध्यान बटा कर इस बात से इनकार कर रहे हैं कि वास्तव में पाकिस्तान में कोई समस्या है भी.
और जब तक ये स्तिथि को इमानदारी से जायजा ले कर स्वीकार नहीं करते, सुधार की तो सोच भी नहीं सकते. मतलब इन्होने यह मान लिया है कि चाहे देश भांड में जाये इन्हें कुछ नहीं होगा.
कितना गलत सोच रहे हैं? एक बार अपने सारे कमरे बंद कर के एकांत में निष्पक्ष हो कर फिर से सोचें तो पता चल जायेगा कि क्या हो रहा है.
शायद आप लोगों ने भस्मासुर का किस्सा न सुना हो. अगर सुना होता तो पता होता कि असल तालीबान वही है जिसे आप बुरा तालीबान करार रहे हैं. वास्तव में ऐसी जितने भी गुट हैं जो कलयुगी राक्षस का काम कर रहे हैं वे शक्ति और समृध्धि पाने के लिए कलयुगी देवताओं की तपस्या करते हैं. जिनमे आज एक नहीं कई शिव हैं जो इन भस्मासुरों को अमरता का वरदान देने पर तुले हुए हैं. समस्या तब बढ़ जाती है जब ये भस्मासुर निवासी हों.
आप कलयुगी देवताओं को इस बात का तनिक भी अहसास नहीं है कि यदि ये भस्मासुर इसी तरह बढ़ते रहें और किसी दिन अपनी औकात पर आ जाएँ तो आपको किन कंदराओं में शरण लेनी पर सकती है.

आपने कहा