एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for March, 2009
एक बेनाम यादगार मुलाकात
Mar 30th
मिटती नहीं है याद से
जब कहीं दूर अपने घरौंदों से
मिले थे उन्मुक्त भाव से ठंडी सड़क पर
तीखी हवाओं के बीच से
जो चीर कर निकला करती थी छुपी हुई देह को
हम चले थे हाथों में हाथ डाल
बात उस रात की
मिटती नहीं है याद से
जो कहा था तुमने
तुम किसी से खुलती नहीं
इसलिए कि तुमसे कोई खुल कर मिला नहीं
चुप रहना समझ लेती हो बेहतर
और देती हो आजादी उनके विवेक को सोचने का
मिटती नहीं है याद से
यह सोच कि कितना अजीब होगा
तेरे अन्दर का कोलाहल
जो सुन न पाए खुद चुप रहने वाले
मैंने देखी है वह अल्हड़ और शर्माती हंसी
जो जानती है कहाँ जाती है उसकी चोट
और छोड़ जाती है दिल पर खराश
मिटती नहीं है याद से
कि हम मुस्कुराते थे साथ साथ
दुनिया से छुपकर
सिर्फ इसलिए कि कहीं शुबहा न करने लगे लोग
और उन्मुक्त हंसी को दे दें कोई नाम
एक बेनाम यादगार मुलाकात को
मिटती नहीं है याद से
कि छोड़ आया मैं तुम्हे तनहा सुरुरों में
यह सोच कि खलल न पर जाये तुम्हारे ख्वाबों में
और सो न सका कई-कई रात
खुली आँखों से सपना देखते हुए
तुम्हे काले कपडों और सफ़ेद रोशनी के बीच
बिना यह सोचे कि यह तुम्हारा भी सपना या नहीं
होली बहुत जरूरी है
Mar 11th
जो नर न खेले फाग
कल जायेगी उसकी बीवी भाग
और यदि वो हो एक नारी
मिले न उसको सुन्दर साड़ी
शौहर उसका पी के भंग
करे पडोसन संग हुरदंग
न मान बुरा मेरी बातों का
भूत हुआ मैं लातों का
आज नहीं खुद में रहना है
जो आये जी में कहना है
इतना होश अभी है बाकी
होली मुबरक तुम को साकी
सुन लो मेरी इतनी बात
रहो मगन तुम इस दिन रात
चाहे जो मजबूरी है
होली बहुत जरूरी है
पंजाबी और बिहारी
Mar 11th
कुछ सालों पहले मैं दिल्ली में था. वहां एक चलन है कि मजदूर टाइप के आदमी को बिहारी बुलाते हैं, साथ ही यह संबोधन गाली के रूप में भी प्रयोग होता है. इस शब्द का प्रयोग यदि आप गौर से देखेंगे तो ज्यादातर हरियाणवी या पंजाबी लोग करते हुए मिलेंगे. ऐसा इसलिए कि दिल्ली उनका पड़ोस है और उस पर उन्हें अपना हक़ ज्यादा दिखता है. मुझे इस लगाव की भावना से ऐतराज भी नहीं.
मैं इसका उतना बुरा नहीं मानता क्योंकि मुझे पता है की स्थानीय लोगों को हमेशा से प्रवासी लोगों से थोड़ी सी असहजता महसूस होती है और यह मनोवैज्ञानिक स्तिथि ज्यादा है और सामाजिक कम. इसे हलके भाव से लेना ही अच्छा है. अपने लन्दन प्रवास के समय भी मैंने कई बार “गो होम यू ब्राउन बास्टर्ड्स” सुना है. हालाँकि लन्दन में यदि इस बात की शिकायत ले कर आप अदालत चले जाएँ तो ऐसा बोलने वालों की शामत आ जाये जो यहाँ शायद मुश्किल है.
परन्तु एक रोचक बात मुझे अपने एक रिश्ते के भाई, जो शौकियाना गुरुमुखी सीख रहे थे, से पता चली कि गुरुमुखी में बड़ी “ई” की मात्रा को बिहारी कहते हैं. और तब का दिन और अब जब भी मुझे कोई पंजाबी बिहारी कह कर बुलाता है तो बड़े सहज भाव से कह देता हूँ कि अब हमें निकाल दोगे तो सिर्फ पंजाब बचेगा पंजाबी नहीं और उत्तर में मिलती है एक प्यारी सी हंसी.
इस होली में आपको क्या लगाऊं?
Mar 9th
इस होली में आपको क्या लगाऊं?
रंग दूं चोली, रंग दूं साड़ी और रंग दूं सबकी आत्मा
आज रंगूँ मैं उसी से सबको जो भी मेरे हाथ में…
देखो भाइयों, भाभीयों, सालियों और सरहजों और दोस्तों. बहने कृपया चरण छू लें या छुवा लें और दूसरी टोली में जाएँ. बाकी बचे लोग अपनी पसंद बता दें, क्योंकि हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास रखते हैं और सबको अपनी बात कहने का मौका देता हैं. और हाँ जाते-जाते अपनी पसंद के गड्ढे का नाम बता दें, ताकि अगले साल हम पहले से ही आपके लिए व्यवस्था कर के रख दें.
और हाँ अपने धोती, कुरता, चढ्ढी, बनियान वगैरह की मजबूती जरूर चेक कर लें, कुछ ऐसा वैसा सीन बन जाये तो ….तो क्या होली है भई. अब यह बताएं की आपको क्या लगाया जाये.
गोबर? हाँ? कौन सा? गाय भैंस का या सूअर का या आदमी का?
कीचड़? हाँ? कौन सा? नाली वाला या खेत वाला?
धूल? हाँ? कौन सा? सड़क वाली या होलिका वाली?
कालिख? हाँ? कौन सी? तवे वाली या साईलेंसर वाली?
पेंट? हाँ? कौन सी? निकेल या डिस्टेम्पर?
रंग? हाँ? कौन सी? लाल, गुलाबी, हरा, पीला, नीला या काला?
गुलाल? हाँ? कौन सी? अबरख वाली या अरारोट वाली?
अरे इतना सोचने की फुर्सत नहीं है अब इधर आ ही गए तो सामने जो है उसी में गड्ढे में कूद जाइये, या हम अपने पसंद के गड्ढे में धक्का दें?
कौतुक की तरफ से सबको होली की बधाइयां.
मिथिलाक विकास कोना होएत
Mar 9th
मिथिलाक प्रत्येक व्यक्ति जे बाहर रहैत छथि सम्भवतः वापस आबए चाहैत छथि, मुदा करता की? जतए कतहु रहैत छथि जीविका उपार्जन मे ओझरा कए रहि जाएत छथि आओर यदि ओहि सँ उबरि गेलाह तँ धनोपार्जन मे लागि जाएत छथि। काज ई दुनु सेहो जरूरी छैक।मोन हुनको कचोटैत होयेबे करतन्हि जे मातृभूमि लेल किछ नहि कए पाएब रहल छथि। तथापि किछ लोकन्हि एहन होयेताह जे किछ करए चाहैत होएताह। कोनो व्यवसाय, कोनो नौकरी वा स्वाध्याय। परन्तु एक नजरि अहि पर देल जाऊ जे अवसर कतेक अछि?
हमरा लंदन सँ दिल्ली आबै मे 10 घंटा लगैत अछि मुदा दिल्ली से गाम पहुन्च्बा मे 20 घंटा। छोरु दिल्ली के पटना मात्र 175 किलोमीटर अच्छी मुदा लगभग 8 घंटा लागि जाएत अछि, दरभंगा मात्र 35 किलोमीटर लेकिन लागत दू घंटा । तहु पर यदि राति भय गल तँ रास्ते मे रहै परत। चलू ओहो स्वीकार दु पाई कम्मे कमा कए बच्चा सबहक नीक शिक्षा के सोची तँ युनिवसि॓टी आ विद्यालय केर हालत देखि कए सिहरि जाएत छी।यदि स्वास्थ्यक कोनो समस्या होए तँ कतय जाएब? गाम में तँ डाक्टर भेटता तकर कोनो गारंटी नहि.
ई सम्भव नहि छैक जे परिवारक रिस्क लय कय समाजक उद्धार करय लेल सभ लोकन्हि सहमत होएत. एहन बहुत रास छोट छोट गैप छैक जे ध्यान मंगैत छैक. वास्तव में बहुत स्वार्थी भये कय कही सकैत छी जे यदि कोई कठिन परिस्थिति से उबरि जायेत तँ वापस ओही में नहि जाए चाहत। तथापि एहन कम्मे मैथिल छथि जे गाँव सँ संपर्क निकुन्न कयने छथि.
जे समाज मे रहि रहल छथि यदि हुनका दिक्कत नहि होयेत छन्हि आओर यदि दिक्कत होयेत छन्हि तँ ओ चुप्प छथि तँ बाहर रहनिहार की करताह?
हमरा अंदाज सँ अधिकतर लोक जे बाहर रहैत छैथ कोनो ने कोनो रूपे गाम के मददि करिते छैथ। अधिकांशतः आर्थिक रुपे। तँ यदि अर्थ मददि नहि कए सकैत अछि तँ की मददि करत?
अहाँ कही सकैत छी जे नब विचार मददि करतैक। मुदा विचारक उपयोग लेल बहुत निष्ठा, सकारात्मक सोच आओर अधीर प्रयत्न लग्तैक। दोसर बाहर रहनिहार वाला सँ सोच मिलब सेहो अत्तेक आसान नहि छैक. बेसी काल सुननिहार के ई लागतैक जे छाँटि रहल छथि. हमर कहब जे पहिन प्रयास जे लोकन्हि गाम में रहि रहल छठी हुनका लोकन्हि के करय पड़तन्हि.
गाम विकास नही कएलक ता दोष ककर, पहिल दोष हरदम नागरिक के होएत छैक. हम ई मानैत छी जे ई आसान काज नही छैक. ताहि पर सँ ई बड़का छोटका आओर जाति धर्मक राजनीति जे प्रत्येक गुप्प में घुसि जायेत छैक से अलग. मुदा परिस्तिथि के अनदेखा नहि कएल जायेत सकैत अछि.
एकर निदान हमरा विचार सँ “जागरूकता” थिक. यदि कहुना कय सभ मैथिल के ई बुझायेल जाय सकैत
- जे विकास पहिल प्राथमिकता होएबाक चाही चाहे नेतृत्व कोनो वर्गक हाथ में रहए
- कि सरकारी तंत्र से काज कोना करौल जाए से बुद्धि सभ के बतोल जाए
- कि ग़लत होएत काजक विरोध कोना कएल जाए
- कि शिक्षा सभहक लेल जरूरी छैक ओर ओकरा में कोनो भेद भाव नही राखल जाए
- कि वर्गक भेद सभ काज में नही आनी, पावनि त्यौहार, वियाह दान अलग थिक आओर समाजक विकास अलग
- कि चुनाओ में वोट जातिक नहीं बल्कि उमीदवार के व्यक्तित्व अओर ओकर क्षेत्र के प्रति निष्ठां पर आधारित रहय
- कि सरकार कोण कोण योजना गमक विकास लेल शुरू कयने अछि अओर ओकर प्रगति कोना भये रहल अछि
- कि अधिकारीगण से कोना काज कराओल जाय
- कि मात्र छोट मोट निज स्वार्थ लेल समाजक हित ताक पर नहि राखी
एहन बहुत रास गुप्प छैक जे समाज के विकासक दिश लय जायत.

आपने कहा