एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April, 2009
हैप्पी बग्गिंग..आउच..हैप्पी ब्लॉग्गिंग
Apr 23rd
कुछ दिनों के लिए अवकाश पर हूँ. बिटिया का मुंडन है.
लौटने पर कुछ नया लिखने की कोशिश करूंगा. तब तक के लिए सभी ब्लॉग साथियों को नमस्कार. तीन दिन की यात्रा जाने की, तीन दिन की यात्रा आने की. दो दिन देवघर आने-जाने के लिए, एक दिन सिमरिया जाना होगा. समय लगा तो पटना भी जाऊँगा, पुराने दोस्तों से मिलना हो जाये शायद. फिर दो दिन कोलकाता का भी आनंद लेना है. कुछ न कुछ तो सूझ ही जायेगा, आशा है कुछ अच्छा लिखने को मिलेगा. More >
केवा-दात्शी: भूटानी व्यंजन-०१
Apr 23rd
http://daalrotichaawal.blogspot.com/2009/04/blog-post_23.html
अभी अभी रचना जी ने शिकायत और तगादा की, तो सोचा उन्हें निराश करना ठीक न होगा. तो आइए आज आपको एक भूटानी व्यंजन, केवा-दात्शी, के बारे मे बताऊँ.

भूटान मे चीज को दात्शी कह्ते हैं. वहाँ आपको तरह तरह के व्यंजन मिलेंगें जो चीज के साथ बनती हैं. आलू को केवा, मिर्च को एमा, बीफ़ को शोमू, मशरूम को शामू कहा जाता है. और भी चीजों के अलग अलग नाम हैं.
सामग्री:
४ आलू मध्यम आकार के
१/३ कप घिसा हुआ सफ़ेद चीज
१/४ कप बारीक कटे हुए प्याज (लाल वाले, इसका स्वाद अच्छा होता है)
१ बड़ा टमाटर, महीन काट कर रख लें
१ बड़ा चम्मच तेल
नमक स्वादानुसार (चावल के साथ खाना हो तो थोड़ा तेज रखें)
मिर्च पाउडर स्वादनुसार (थोड़ा तीखा हो तो अच्छा लगेगा), आप हरी मिर्च भी प्रयोग कर सकते हैं.
विधि:
आलू को छील कर थोड़े मोटे चिप्स की शक्ल मे काट लें. एक कड़ाही में तेल गर्म कर आलू डाल दें, भूने नहीं तुरन्त नमक और उबलने लायक पानी डाल दें. उबलने के बाद थोड़ा पानी रहने दें ताकि बांकी सामग्री मिलाने के बाद भी गीला रहे. जब आलू पुरी तरह पक गया हो तो कटे हुए मिर्च, प्याज और टमाटर मिला कर दो मिनट और उबलने दें, फिर आँच बन्द कर उपर से चीज छिड़क कर ढक दें. अगले दस-पन्द्रह मिनट में चीज पूरी तरह पिघल चुका होगा और आपका केवा-दात्शी तैयार है.
आप इसे लाल वाली चावल (मेरे लिए उसका भात) के साथ खाएं तो उसका एक और ही आनंद होगा.
पुकार
Apr 23rd
त्याग कर अभिमान अपना
रख धरा का मान ले तू
पाया बहुत कुछ अभी तक
अब दान की भी ठान ले तू
जी चुका बहुत अभी तक
निज, सखा, संतान खातिर.
मान ले तू, धर्म तेरा
है निज नहीं, संसार-सेवा.
जो जिया है व्यर्थ अभी तक
हो गयी हो क्षीण शक्ति.
माना यह अंतिम प्रहर है
फिर भी जननी बाट जोहती.
न सोच इतना, चल चला चल
देख है अब साथ कितना.
समीप जीवन का अस्ताचल
क्यों रोकता तू हाथ अपना.
चाह तेरी भी है मानव
जाति तुझको याद रक्खे.
एकांत में मृत्यु वर कर
क्यों तुझे कोई याद रक्खे.
है नहीं कोई पुकार यह
जो मांगता तेरा धन अपार है.
मांगता है अंश अवयव
तेरे अनुभवों का समाज है.
अब समय है दान दे तू
और नहीं कुछ, ज्ञान दे तू.
दीन हीन निश्छल पड़े हैं
पशु सदृश तेरे सहोदर.
देख, ठगना उनको सहज है.
सुन, मर्दन उनका महज है.
बता, क्या यह देखना भी
तुझको उतना ही सहज है?
यह उन लोगों के लिए है जो जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर अपने उतरार्द्ध में भी समाज सेवा से इसलिए डरते हैं कि कहीं उनके सम्मान या अभिमान को ठेस न पहुंचे. चाहते हैं कि समाज बदले, पर अंहकार आगे आता है. जो दीन है, जो गरीब है उसका तो मात्र अंहकार ही सहारा है, वह अपने को समझा लेता है “गरीब हैं तो क्या हुआ, अपने मन की तो कर ली”. पर आप जो प्रबुद्ध हैं कैसे देख सकते हैं अन्याय होते हुए, उन्हें पशु की तरह जीते हुए. इस सन्दर्भ में एक आलेख लिखा था, समय हो तो उसे भी पढें.
और अब लीजिये बिकनी जींस
Apr 22nd
आज ही पता चला जापानियों ने जींस का एक नया स्टाईल तैयार किया है. वैसे मेरे विदेश में रहने वाले मित्रों को शायद अब तक इसका पता चल गया हो. पहली नजर में तो मैं कुछ और ही समझ गया था.
मैं ऐसी तस्वीरें अपने ब्लॉग पर नहीं डालना चाहता इसलिए स्वयं देखिये बिकनी जींस का गूगल इमेज सर्च परिणाम
बहुत जल्दी अपने देश का रास्ता भी अख्तियार कर लेगा. तो देखिये और कहिये क्या ख्याल है आपका.
जानकी! कतए छी? आउ नैहर
Apr 21st
जानकी! कतए छी? आउ नैहर.
देखू ने धिया पुता सब पैघ भय गेल.
किछ तऽ नेतो बनल अछि.
पैघ कुर्सी पर चढ़ल अछि.
वचन दऽ कय जाए कोना
दृग आ मुंह मोरि लेने अछि.
जानकी! कतए छी? आउ नैहर.
आउ बुझबियौक ओकरो कने
कोना राम राज्य चलै छल. More >

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