एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 3, 2009
यह मौसम भी चला जायेगा
Apr 3rd
मेढकों के टर्राने के दिन हैं.
सियारों के गाँव आने के दिन हैं.
जो कभी दिखते भी नहीं,
उनके हाथ जोड़ सर झुकाने के दिन हैं.
यही एक दिन तो हम आम इंसानों के दिन हैं.
यह मौसम भी चला जायेगा
अपने साथ मेढकों और सियारों को ले कर.
और हम यहीं होंगे अपने दालानों पर
उनके दिए कम्बल और धोती लपेटे हुए.
और खबर आयेगी “फलां बिन इलाज मर गया”.
कल ही की तो बात है
दुक्खन नाचता था सड़कों पर
ताड़ी पी कर पहले पहल बाप बनने की खुशी में.
ताड़ी तो आज भी पीता है सुबहो शाम,
पर उस के नाम जो हस्पताल के रास्ते में मर गयी
उसके दालान पर खांसता उसका बूढा बाप
कोसता है उसको वही कम्बल ओढ़े हुए.
जो नेताजी दे गए थे अपने हाथों से
और कह गए थे, बाबा तुम्हारा ही बेटा हूँ मैं भी.
वह मासूम चेहरा भरा खुशहाली का इश्तहार
आज भी चिपका है मिट्टी के दीवार से.
इतनी मासूमियत हो जिनके दिलों में
वे दुःख को क्यूँ कर समझने लगे.

आपने कहा