एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 6, 2009
मैं उर्मीला मतोंडकर से शादी करना चाहता था
Apr 6th
जवानी के दिनों में लगभग हर लड़का किसी न किसी अदाकारा का दीवाना हो जाता है. मैं उर्मीला का था. पर दिल को पूरा यकीन था की उर्मीला तो हमारे लिए चाँद है. और यदि चाँद मिल भी जाये तो उसे रखोगे कहाँ? मान लो वह कह भी दे कि मैं तुम्हारे दिल में रह लूंगी. पर दिल में खाना-पीना, सोना, गाना, नाचना और नहाना-धोना, कपडे सुखाना, सामान रखना, गाड़ी पार्क करना वगैरह? ना बाबा ना, रखूंगा तो घर ही.
फिर हमने ख्याल किया कि पूरी की पूरी उर्मीला न रख कर उसकी छवि दिल में बसा लेंगे. पर हुआ यूँ कि हम आ गए नौकरी में और हमारी प्यारी उर्मीला दिल में अन्दर ही अन्दर बहुत अन्दर दबती चली गयी. उसके ऊपर आ गया था महीने का किराया, मोटरसाईकिल की किश्तें, बनिए का बिल आगे की पढाई-लिखाई के खर्चे वगैरह.
फिर हमारी माता-राम को यह समझते देर नहीं लगी कि अब मुझे उर्मीला की जगह यदि कोई और देखभाल (परेशान) करने वाली कुछ साल और न आयी तो फिर कहीं मैं भी वाजपेयी जी से प्रेरित न हो जाऊं. सो चारों और जासूस भेजे और ढूंढ ही लिया हमारे वर्त्तमान पत्नी को. (यह भी प्यारी कहानी है, लिखूंगा जीवनी में
)
अब आप पूछोगे कि अचानक से उर्मीला की याद क्यों आ गयी? तो हुआ यह कि मैं अभी अभी एक नुक्कर पर चाय पीने गया और वो दिख गयी. फिर मुझे याद आया कि उर्मीला अभी तक कुंवारी है. और मन में पश्चाताप की भावना आ रही है कि कहीं वह तपस्या तो नहीं कर रही. वैसे भी उसकी योग मुद्राएँ बहुत गंभीर होती हैं. रंगीला की उसकी मुद्राएँ तो बाबा रामदेव को कभी भी पछाड़ दे.
अब उर्मीला दिल में इतनी अन्दर घुसी हैं कि ढूंढें नहीं मिलती, और मिलेगी भी कैसे उसके ऊपर बाकी जिम्मेदारियों और दो बच्चों के साथ आजकल एक महिला बैठी दिखती है, जिसे लोग बहुत ही आदर से मेरी पत्नी कहते हैं.
बेचारी उर्मीला तक यदि कोई यह सन्देश पहुंचा दे कि मैं अब उसके काम का न रहा. ताकि वह भी किसी का, भूतों के कॉमेडी फिल्में बनाने वाले का ही सही, हाथ पकड़ ले.
नेता, भ्रष्ट, घमंडी, मतलबी, चोर, निर्लज्ज वगैरह वगैरह
Apr 6th
जिसको दिल में आया ब्लॉग लिखा, जिसके मुंह में आया किसी नुक्कर पर खड़े हो गए और हजारों गालियाँ नेताओं को दे दी. नेता, भ्रष्ट, घमंडी, मतलबी, चोर, निर्लज्ज वगैरह वगैरह.
मैं यह सोच कर गलती नहीं कर रहा कि हमें और नेताओं की जरूरत है. और नेता का मतलब तो यह भी नहीं होता होगा कि सब के सब सीधे दिल्ली पहुँच जाएँ. तो मैं यह मान कर चलता हूँ कि जरूरत है. हमें ऐसे नेता चाहियें जो हमारी समस्याओं को समझते हों और जिन तक हमारी बात सीधे-सीधे पहुँच सके. तो मैं उन नेताओं को निचले स्तर पर गलियों, मुहल्लों, गाँवों के स्तर पर नेता बनाना चाहूँगा.
मुझे मालूम है कि मैं कोई नई बात नहीं कर रहा. पर पुरानी बात को क्या हो गया है? हमने जो कडियाँ जोड़ रक्खीं थी उसे क्यों तोड़ दिया? हमें बिलकुल जमीनी तौर पर काम करने वाली पार्टियों के नेता सबसे निचले स्तर पर चाहियें जो निज स्वार्थ के लिए, या सिर्फ अपने घर और कार के ऊपर हरा, नीला, लाल, गेरुआ झंडा न लगते हों. जिन्हें यह भी नहीं लगता हो कि वे मोहल्ले के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनते जा रहे हैं. जो इस बात का ख्याल रख सके कि किस चीज की जरूरत है. ऊपर कही हुई सारी बातें मैं ने होती हुए देखा है.
पर ऐसे नेता हम लायेंगे के कहाँ से? जिसको भी गली का नेता बनाने का मौका मिला वही शेर हो जायेगा. मेरा ख्याल है चुनाव समाज के सबसे छोटे छोटे निवासीय टुकड़े से शुरू होनी चाहिए.
मेरा विचार है कि ऐसे चुनाव हर गली-मोहल्ले में हों, जिसमे उस स्थान का प्रतिनिधि सालाना चुना जाये, और वह अपने से ऊपर के स्तर के नेता, अधिकारी वगैरह से सीधा मिले. यह अधिकार उनको स्वयं मिलने लगेगा जब नेताओं और अधिकारीयों को यह पता चलेगा कि इस व्यक्ति की बात पर जनता उनसे मुंह फेर सकती है.
अब इनमे भी भ्रष्टाचार जैसे अवगुण की संभावनाएं हैं. उसका निदान यह है कि इन नेताओं के ऊपर के नेता और अधिकारीगण भी लोगों के सीधे पहुँच में हों और इनका सालाना चुनाव होना चाहिए और यह कार्य मोहल्लेवासियों द्वारा स्वयं किया जा सकता है. साथ ही लोगों को भी यह भी अधिकार हो कि साल के बीच में ही जरूरत समझने पर बहुमत से उसे बदल सकें.
मतलब अभी आप अपने नेता को जानते हो और उसके ऊपर के नेता को भी. जैसे कि गली का नेता फिर वर्ड कमिश्नर स्तर का नेता या मुखिया. इस से यह होगा कि संवाद में हेर फेर के मौके कम हो जायेंगे. आपने कोई शिकायत या सुझाव दिया पर वह आपके नेता ने ऊपर के नेता तक नहीं पहुंचाई. ऐसी हालत में जब आपका संवाद उसके ऊपर के नेता से होगा तो आपको पता चल जायेगा कि आपका नेता ठीक काम नहीं कर रहा.
और ऐसी व्यवस्था हर स्तर पर होनी चाहिए. आपकी गली के नेता का भी वार्ड कमिश्नर और मुखिया के ऊपर के नेता तक पहुँच होनी चाहिए. तभी पारदर्शिता और जिम्मेदारी का भाव आयेगा और सबको इस बात का दर रहेगा कि उसकी कामचोरी या कोताही उसका नुक्सान तो अवश्य करेगी.
जब हमारा देश ऐसे नेताओं से भरा होगा तभी हमारी बात ऊपर तक पहुंचेगी. यदि किसी पेड़ के पत्ते चमकदार और सुन्दर हैं तो इसका मतलब है उसकी जड़ जमीन के बहुत नीचे से पूरे तंत्र को ऊर्जा प्रसारित कर रही है. फिर देखेंगे कि इनमे से कुछ ऐसे नेता होंगे जो उभर कर ऊपर आएंगे और जमीन से जुड़े अनुभव के साथ देश चलाने का काम कर सकेंगे.
फिर आप न कह सकोगे नेता, भ्रष्ट, घमंडी, मतलबी, चोर, निर्लज्ज वगैरह वगैरह.
कृपया अपने विचार व्यक्त करें ताकि जरूरी संशोधन भी किया जा सके.
राह चलते बच्चों को लिफ्ट न दें
Apr 6th
बंगलोर में आवासीय क्षेत्रों में आपको बच्चे स्कूटर-मोटरसाइकिल वालों से लिफ्ट मांगते दिखाई दे जायेंगे. शायद ऐसा अन्य शहरों में भी हो. शायद आप में से कुछ लोग सहृदय होकर उन्हें लिफ्ट दे भी देते होंगे.
पर शायद आपने इस पहलू पर गौर ही न किया होगा कि आप कितना बड़ा जोखिम अपने ऊपर ले रहे होते हैं. यदि दुर्योग से आपकी गाड़ी किसी दुर्घटना का शिकार होती है और उसमें वह बच्चा थोड़ा भी आहत होता है या न भी हो और पुलिस आ जाये. और आपसे पूछे कि वह बच्चा कौन है, तो आपको पता है आपकी क्या दशा होगी?
आप पर सीधे-सीधे अपहरण का मामला बन सकता है. फिर आपकी सारी की सारी सहृदयता धरी की धरी रह जायेगी. और जो काम आप छोटी सी भलाई सोच करने चले होंगे वह आपके परिवार की तबाही का कारण बन जायेगी.
आप भी मेरा क्रोध लीजिये
Apr 6th
अभी अभी टाईम्स ऑफ़ इंडिया में पढ़ा दिल्ली में एक पिता ने अपनी चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया.
मेरा न्याय – उसे इस नारकीय जीवन से मुक्ति दो.
फिलहाल मेरे पास शब्द नहीं हैं, कुछ है तो सिर्फ क्रोध. यदि आपके पास शब्द हों तो व्यक्त करें. जब मन की पीड़ा विचार में घुल जायेगी तो शायद कुछ कह सकूं. अभी तो मैं केवल अपना क्रोध बांटना चाहता हूँ.

आपने कहा