एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 8, 2009
कविता बदल गयी
Apr 8th
हुआ करते थे जिसके दीवाने कई हजार
फिर भी था आपस में बहुत प्यार,
कहते थे एक साथ “वाह! क्या चीज है यार”.
वह उनके रोमांच की शालीनता थी
और था गाम्भीर्य उनके प्रेम का.
जो कहती थी “बनाने वाले ने क्या बनाया है”.
कविता! जो अलंकारों से सजी, शब्दों से बनी,
जिसे हजारों ने कहा “सुन्दर”
और दिल में लिया उतार.
वो किसी की रचना नहीं रह गयी.
जिसे उसका जनक अधिकतम चाहता था,
और संभालता था उसके छलकते सौंदर्य को.
हाँ अब समय बदल गया है
फिर कविता भी बदल गयी है
और बदल गए उसके चाहने वाले.
अब तो कविता का नाम ले कर
हो जाते हैं कितने फसाद
और हो जाते हैं कितने ही घर बर्बाद.
ई का हो रहा है भई?
Apr 8th
लताड़ रहे फुरसतिया, देखो अरविंद भैया को,
काहे सब के आगे कहे स्वयं को बुडबक-भकुआ हो.
भावुक समीर, हँसे ताऊ जी, मुस्काएं सब ज्ञानी जी.
देख के संतन के ई झगड़ा कौतुक भरते पानी जी.
रही बात आत्म-प्रक्षेपण की, तो क्यूँ गरमाए जाते हो.
किसी के बलिहारी की अदा पर भी ताव खाए जाते हो?
और मिसर जी आपहुं कम नहीं, बना दिया तिल को एक ताड़.
अब जो शुकुल जी फिर गरियायें, लेंगे उनका क्या बिगाड़?
लगे रहो हे प्रभुपाद तुम ऐसे ही ब्लॉग-मंथन में.
सीख रहे हैं मुझ से अकिंचन तुम्हारे इस घमर्थन* में.
नहीं नहीं, हम न पड़ते इस चर्चा-प्रतिचर्चा में.
हम तो खुश हैं, अपने इस छोटे से परिचर्चा में.
नोट: “घमर्थन” मैथिली शब्द है, मतलब होता है बहस.
अपने पोस्ट का यु आर एल (लिंक) बदलना न भूलें
Apr 8th
हम जब भी पोस्ट लिखते हैं तो वर्डप्रेस (शायद ब्लॉगर भी) पोस्ट का यु आर एल पोस्ट के नाम से बना लेता है. अंग्रेजी पोस्ट हो तो यह चलेगा, परन्तु हिंदी व अन्य भाषाओँ के ब्लॉग में एक परेशानी आती है की यु आर एल से पोस्ट के नाम का पता ही नहीं चलता और वह बहुत बड़ा भी हो जाता है.
अब नीचे देखें. पोस्ट का नाम है बदलाव, पर मुझे स्वयं इसे देख कर यह बदला हुआ लगता है
http://paricharcha.wordpress.com/2009/01/22/%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b5/
अभी इसे पोस्ट लिखते समय या पोस्ट लिखने के बाद भी बदल सकता हूँ. जैसे कि अब मैंने इस पोस्ट को कर दिया
http://paricharcha.wordpress.com/2009/01/22/badlav/
इस से लिंक छोटा हो गया और इसके फायदे आप में से शायद हर कोई समझता है.
इतना ही नहीं, वर्डप्रेस लिंक बदलने के बाद भी इसी पोस्ट पर आने में सक्षम है. आप पहले इसे आजमायें फिर प्रयोग करें. वो क्या कहते हैं..
पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें.
एडवांस में धन्यवाद दई दीं, की धीरज रखाई?
Apr 8th
मैं पिछले कुछ समय से लिख रहा हूँ. कुछ रचनाओं को आप लोगों ने पसंद भी किया, टिप्पणियाँ भी मिली हैं. पर मुझे संतुष्टि नहीं है. और मुझे स्वयं में कोई सुधार नहीं दिखता. कहीं ऐसा तो नहीं कि आप “कहीं बुरा न मान जाये” जैसी भावना से पीड़ित हैं?
मुझे पूरा विश्वास है कि कुछ गलतियाँ मैं बार-बार दुहरा रहा होऊंगा. और कुछ क्या, बहुत से जगहों पर सुधर की बहुत गुंजाईश है. आप में से किसी ने अभी तक कोई खामी नहीं बताई. ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि सब कुछ ठीक ठाक है. तो मैं अनुरोध करता हूँ आप लोगों से, मेरे लेखन की कमजोरियाँ उजागर करें. मैं आभारी रहूँगा. बेबाक बताएं! क्या क्या कमी पाई? कविता में भी अनुरोध करता हूँ.
फुरसतिया के अखबार में हमर नाम छपि जाई
तो काहे ना कौतुक तोहार आभार जताई.
हे सखी थोड़ी निंदा करहु कलम हमर धुलि जाये
ब्लॉग जगत का कहें, जगत सगर छपि जाएँ.
गुनी जन संगत पाई के कौतुक प्रबुध्ध होइहें
सखी इतना कहीं, ई से तुहार की घटि जैहें.

आपने कहा