एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 10, 2009
जूता गान
Apr 10th
जूता जूता, जूता जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
पहनो जूता, फेंको जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
खाओ जूता, पाओ जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
फेंक दिया किसी ने जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
बचा गया फिर कोई जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
काला जूता, सफ़ेद जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
पीला जूता, नीला जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
हरा जूता और लाल जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
पूरा जूता, आधा जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
सस्ता जूता, मंहगा जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
भारी जूता, हल्का जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
ताऊ का जूता, भैया का जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
भाई का जूता, बहन का जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
नेता और अभिनेता को जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
टीवी पर जूता, पेपर में जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
भाषण में जूता, राशन में जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
और नहीं कुछ सूझ रहा तो
भज प्यारे मन जूता जूता
कविता जूता, कथा भी जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
ब्लॉगर और पत्रकार जन
तुम भी बजो अब जूता जूता
मैंने कहा अब न छोडो जूता
भज प्यारे मन जूता जूता
-x-
अमाँ अब बस भी करो यार
थोरा जूते से ऊपर आओ
मोजे की बार करो
पैंट की बात करो
स्कर्ट की बात करो
चढ्ढी की बात करो
अंगिया की बात करो
बनियान की बात करो
शर्ट की बात करो
टाई की बात करो
और नहीं हो कुछ
तो क्या जरूरी है बात करो?
यह कैसी कविता है?
Apr 10th
यह कैसी कविता है?
जो किसी का किसी से प्रेम न बताती
न कोई विरह में हुआ दीवाना.
क्या सुन्दर भाव का हुआ अभाव?
यह भी कोई बात हुई कि
लिखा भी तो अवगुण समाज के.
जरूर यही हुआ होगा.
तुम क्या जानो क्या है प्रेम.
जबकि मिलता है यह हर गली-मोहल्ले.
दफ्तरों, बाजारों और सिनेमा की कतारों में.
और अब तो मिलने लगा है फ्री यह
विवाह और डेटिंग के इश्तहारों में.
फिर भी न मिले तुमको ये ढाई अक्षर
लिखते सुन्दर, प्यारी, कोमल सी कविता
जो कर देती सब दुःख ओझल.
हमने भी तो सब देखा है, सब जाना है
यूँ ही नहीं तो छोड़ आये उनको
फिर तुम हमको क्यूँ हो पकाते.
कैसे कहूं मैं तुमसे ये सब कि
रे मनुज नहीं है हार तुम्हारी
जब तक तू ना मान ले.
नहीं शरण तुम्हारा, यह प्रेम तुम्हारा
जो इठलाती प्रियतम की बाँहों में
चाहे स्वर्ग इसे तू मान ले.
है कठिन डगर, पर सुनो मगर.
रोते चिल्लाते ही आये धरा पर.
उत्तर दो, क्या जन्म तुम्हारा रहा सुखद?
यहीं रहेगा देह तुम्हारा, रह जायेगा प्रियतम भी
नहीं सफलता बंधू, अंतिम तक पहुँचने में.
मजा तो है जब मंजिल भी मालूम न हो.
मृत्यु भी है राह देखती
फिर किसका प्रेम तुम्हे रोकेगा
जो सुख न दे पाओगे इस जननी को.
मैं नहीं मानता जननी उसको
जिसने मास नौ है गर्भ धरा
जननी तो है यह, सुन्दर प्यारी वसुंधरा.
आँचल जिसका रहता सूखा
नौ महीने पूरे साल की
कैसे करे वह माता पोषण अपने लाल की.
जो तुम प्रेम पथिक रे
तो सुनो पतित रे, प्रेम करो इस वसुधा से.
आओ हरें पीड़ हम, अपने भारत माता की.

आपने कहा