एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 13, 2009
नौकरियों में औरतों के लिए आयु सीमा में छूट
Apr 13th
सरकारी नौकरियों में ओ बी सी और एस सी / एस टी की तरह औरतों को भी आयु सीमा में राहत मिलनी चाहिए. इस का सीधा सा तर्क है. कई बार ऐसा होता है की पढाई के दौरान ही लड़कियों की शादी हो जाती है और उनकी पढाई में रूकावट आ जाती है. खास कर गांवों और छोटे शहरों में ऐसा अक्सर होता है. जब तक वह अपने को ससुराल में स्थापित करे और फिर से पढाई शुरू करे, कई बार उनके बच्चे भी हो जाते हैं. ऐसे हालात में एक बार फिर से पढाई को छोड़ बच्चों की परवरिश करनी पड़ती है. याने कि फिर से एक लम्बा अन्तराल. ऐसी महिलाओं को यदि अवसरों में आयु सीमा का रोक लगा कर अलग किया जाता है तो यह सरासर गलत है.
वह चाहे किसी भी वर्ग की महिला हो उसे यह हक होना चाहिए की वह अपने उन सखियों के साथ बराबरी कर सके जिसके साथ वह इम्तहान पास करती है. और इसके लिए नहीं बहुत तो आयु सीमा में कम से कम पांच साल की रियायत मिलनी ही चाहिए. विधि निर्माता इसे और भी तर्कसंगत बना सकते हैं. यह अवश्य ही महिलाओं के हित में होगा और उनके परिवार निर्माण में योगदान की क्षमता में वृद्धि करेगा. जिस से समाज और परिवार में उसका महत्व बढेगा.
वैसे तो मुझे इसकी उम्मीद कम ही है कि कोई विधि निर्माता इसे नोटिस में लेगा.
तूती को मालूम है नक्कारखाने उसकी आवाज नहीं सुनती
फर्ज यही है कि फिर भी तूती आवाज लगाती रहे.
ट्विट्टर यूजर्स सावधान!
Apr 13th
ट्विट्टर एक “Mikeyy”. नाम के वोर्म से इन्फेक्टेड है जो इन्फेक्टेड यूजर्स के आई डी से लोगों को सन्देश भेजता है. इन संदेशों में “Mikeyy” या “Stalkdaily” शब्द कोमन है. आपको सलाह डी जाती है कि किसी भी ऐसे सन्देश या लिंक पर क्लिक न करें जिसमे ये शब्द प्रयोग हुए हों.
विशेष जानकरी के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें या “twitter” को गूगल न्यूज़ में सर्च करें.
http://www.pcworld.com/article/162992/twitter_worm_attack_continues_heres_how_to_keep_safe.html
क्या एक महिला के नाम पर वह बस देह है?
Apr 13th
कुमारेन्द्र जी ने लेख के दूसरे चरण में बहुत से प्रश्न उठाये हैं. कृपया नीचे दिए लिंक पर देखें.
http://kumarendra.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html
मेरा मानना है कि यह बहस का दूसरा चरण होना चाहिए. पहले तो हम यह तय कर लें कि क्या हम यह मान लें कि बलात्कार में महिला कि स्थिति, वस्त्र, आचरण आदि दोषी नहीं हैं, बल्कि बलात्कारी किसी न किसी मानसिक अस्थिरता से पीड़ित था या है?
यदि हाँ तो दुसरे चरण में हमें वह सोचना है जो डॉक्टर कुमारेन्द्र ने उठाया है. “क्या एक महिला के नाम पर वह बस देह है”. मैं इस प्रश्न का दूसरा भाग भी पूछता हूँ कि क्या देह सिर्फ “सो काल्ड” अस्मिता ही है? उस पर प्रहार कर दो, उसे छिन्न भिन्न कर दो तो औरत रहेगी ही नहीं.
महिला के नाम पर वह बस एक देह नहीं है, देह के अलावा वो सब चीजें हैं जो एक इंसान में होनी चाहिए. हमने अपने समाज में उसे मानसिक रूप से इतना कमजोर बना कर उसे उसकी अस्मिता से इतनी जोड़ से बाँध रखा है कि अस्मिता के टूटते ही वह भी टूट जाती है. और यदि वह नहीं टूटती तो हम उसे असामाजिक अलंकार देने में परहेज नहीं करते.
वास्तव में हमारे समाज में जो धारणाएं हैं उन्हें तोड़ना बहुत जरूरी है. मैं “काठ की हांडी” वाली धारना की बात कर रहा हूँ. हमें यह पहले स्वीकार करना होगा कि यदि हम काठ के नहीं हैं तो महिलाएं भी काठ की नहीं हैं. हम जिस मानसिकता की बात कर रहे हैं वह यहाँ छुपी है.
इस से पहले कि हम इस “काठ की हांडी” वाली सोच से ऊपर आयें. एक और स्तिथि ली जाये. मान लें कि हमारे समाज में किसी व्यक्ति के साथ जबरन अनैतिक कुकर्म हो जाये. अब उसकी परिस्तिथि अपने समाज में कैसी होगी? पुरुष और महिलाएं दोनों उससे सहानुभूति तो दिखायेंगे साथ ही उस से पतित या निकृष्ट की तरह व्यव्हार भी करेंगे. मानो उसका सबकुछ छीन लिया गया हो. शायद कुछ ऐसी ही स्तिथि महिला की भी होती है जब उसके साथ बलात्कार होता है.
जरूरत है इस बात को समझने की कि इज्जत या अस्मिता कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई छीन ले. वह व्यक्ति जिसके साथ दुर्घटना हुई है वह दया का नहीं मदद का पात्र है. उसे आपकी सहानुभूति नहीं चाहिए, उसे चाहिए आपका बराबरी वाला भाव. आप उसे लुटा हुआ न समझें, यह न समझें कि उसका ऐसा कुछ छीन लिया गया है जिसके बिना उसका जीवन व्यर्थ है. किसी की आँख चली जाये, कोई पिट कर आ जाये, कोई ठगा जाये, कोई लडाई में हार जाये तो हमारी प्रतिक्रिया वैसी नहीं होती. परन्तु जहाँ अत्याचार ने शारीरिक सम्बन्ध का रूप लिया कि हम अपनी सहानुभूति को एक और ही रूप धर देते हैं.
आप अस्मिता को अस्तित्व से अलग कर दीजिये. अस्मिता को रिस्टोर करने लायक चीज मानिये और ऐसा रिवाज भी बनाइये. फिर आप काठ की हांडी वाली मानसकिता से भी निकल पाएंगे. और आप देखेंगे कि आप जिस प्रश्न को उतना महत्व दे रहे हैं वह रह ही ना जाये.
नोट: (पहला चरण http://paricharcha.wordpress.com/2009/04/12/gender-equality-2/ पर उपलब्ध है)

आपने कहा