एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 16, 2009
मेरा भारत महान?
Apr 16th
मेरा बाप मर गया
उस के नाम पर दे दो भाई
उसकी माँ भी मर गयी साहब
उस के नाम पर तो दे दो भाई
मेरे बाप का नाना बड़ा सयाना
उसके नाम पर तो दे दो भाई
अल्लाह के नाम पर दे दो भाई
राम के नाम पर दे दो भाई
ईशा के नाम पर ही दे दे भाई
वाहे गुरु दा खालसा, वाहे गुरु दी फतह
अब तो तुम दे दो भाई.
भिखारी लोग घबरा गए,
इधर उधर भागने लगे,
चिल्लाने लगे, चारो तरफ चिल्ल-पों .
फिर एक आवाज आयी
ये तो हमारे नारे थे
तुम अपनी वाली लगाओ ना.
पब्लिक खड़ी सोचती रही
ये अपने नाम पर कब मांगेंगे.
पुलिस भी खड़ी सोचती रही
इनके आगे-पीछे हम क्यूँ भागेंगे.
जनता परेशान और हलकान
वोट दे कर छुड़ाई जान.
नेपथ्य से आवाज आयी
कब तक दिलासा दोगे खुद को
कह के “मेरा भारत महान” ?
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
Apr 16th
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
इसलिए की लोग जान जाते हैं मेरा नाम
और जब किसी प्रिया का सौंदर्य वर्णन करता हूँ
सोचती है जानकार युवतियां ”कहीं ये मैं तो नहीं”.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
क्योंकि मिलने लगी हैं कुछ युवतियां मेरी पत्नी से,
सुबह, शाम, दोपहर छत के मुंडेर पर.
मुझे डर है कहीं वो लेती न हो मेरा नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि लिखे जो ख़त कभी वो युवतियां,
नहीं पहुँच पाए वे मेरी पत्नी के हाथ.
न मालूम हो किसी को तख्खलुस वाले का नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस.
कि न सुनूं जब गालियाँ दें कोई सरेआम.
देगा वो गालियाँ मेरे तख्खलुस को, देने दो.
मुझे कहाँ आदत सुनने का कोई और नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि कोई नेता जब कभी भड़क जाए.
लाख चाह कर भी मेरी भनक ना पाए,
क्योंकि उसे कहाँ पता होगा मेरा नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस.
लिखने के कारण कहीं बदनाम जो हो जाऊं
तो लोग बाग़ न पुकारें मुझे मेरे नाम से.
और जा सकूं बाहर, सुकून से अपने काम से.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
हाँ बस उन्ही बुरे दिनों के लिए.
यही कौतुक है. वर्ना क्या कम है
मेरा नाम जिन्दगी भर के लिए.
कल चुनाव है
Apr 16th
है आज मुझे नहीं, कुछ सूझ रहा.
और ना ही यह मन, कुछ बूझ रहा.
मुझको है चुनना, मेरा नेता, पर हा!
चाल-चलन उनका, अब भी अनबूझ रहा.
कब तक यूँ अन्धकार में
देगा शब्दभेदी वोट तू.
खोले आँखें, देख बाहर
है कितना प्रकाश पड़ा.
बहुत मुश्किल है!
Apr 16th
बहुत मुश्किल है!
अनूप जी की चर्चा लाईफ की छुपम छुपाई और टिप्पणी रुपी भ्रमर पर मैंने एक टिप्पणी की, और सरल मन से एक सवाल पूछा. [एक राज की बात बताया जाए, इतने सारे चिट्ठे आप चर्चाकार लोग पढ़ते कब हैं? माने कि चर्चा करने का मर्म?] इसमें बड़ाई और गुर सीखने के आग्रह ज्यादा था परन्तु यह बात उसी मतलब से नहीं पढी गयी.
जवाब में आदरणीया कविता वाचक्नवी ने जो कुछ कहा : [जितने चिट्ठों पर टिप्पणी करती हूँ और जितने चर्चा में रखती हूँ, कम से कम उनसे ३० गुना अधिक को प्रतिदिन पढ़ती हूँ। बाकी चर्चाकार भी यों ही तो लिखते नहीं होंगे, यह विश्वास रखिए।] वह मुझे बुरा लगा.
मैंने अपने टिप्पणी में एक सरल मन से सवाल पूछा कि आखिर कैसे कर लेते हैं इतना काम. मेरे इस टिप्पणी में आपको बड़ाई न दिखाई दी, एक शंका दिखाई दे गयी. और आपने सफाई दे डाली. लगे साबित करने कि हम इमानदार चर्चा करते हैं. मैंने कब शक किया? ऐसा मेरी किस बात से लगा आपको?
आप बड़े हैं, अनुकरणीय हैं, सिद्धहस्त हैं. आप की बडाई करुँ तो चापलूस, टिप्पणी करुँ या किसी पोस्ट में आप का नाम लूं तो ध्यान खींचने की कोशिश, सवाल करुँ तो शंका? ऐसे भाव तो न लाईये मन में.या फिर ऐसा तो नहीं कि इस से पहले अनूप जी को बुरा लगे आप लट्ठ ले कर दौर पड़ीं? जरूरत है इसकी?
समझ में नहीं आता आपका विरोध करुँ भी तो कैसे? मैं आप लोगों को पढता हूँ कि कुछ सीख सकूं, हाँ कभी कभार एक टोकन लगा देता हूँ कि हाँ मैं हाजिर था. मालूम है शायद इसकी जरूरत नहीं है. आपको पढने वाले हजारों में हैं जो दिग्गज हैं. हमारे वजूद के होने न होने से आपकी वजन में कोई फर्क न पड़ेगा.
खैर! गलती हो गयी. क्षमा चाहता हूँ. अगली बार टिप्पणी से पहले यह दरयाफ्त कर लूँगा कि किसी को खटके नहीं.

आपने कहा