एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for April 17, 2009
आपको आपकी रचना कैसी लगी?
Apr 17th
हम अक्सर जब भी कुछ लिख कर उठते हैं तो सोचते हैं कि आज हमने बहुत ही धाँसू रचना की है. क्या कहें इतना बड़ा तीर मारा है कि आज तो साहित्य के स्तम्भ उखड़े ही उखड़े. लोग तो बस, क्या कहने हैं. पढ़ते ही झूम उठेंगे. सामने होता तो कहीं हाथ ही न चूमने लगें. पर यह भ्रम टूटने लगता है जब कोई वाहवाही नहीं आती. और कभी वाहवाहियों का सिलसिला रुकता ही नहीं. है ना? और हम फूलते चले जाते हैं मेले में घुमते गुब्बारे के बने जानवरों की तरह.
तो जैसा कि बुजुर्ग ब्लॉगरगण कितनी बार दुहरा चुके हैं कि टिप्पणियों का आपकी रचना के गुणवत्ता से एकदम सीधा संपर्क नहीं होता. ऐसे में आप कैसे निर्णय लेंगे कि आपकी अमुक रचना अतिउत्तम, उत्तम, सामान्य या निकृष्ट है. मैं तो उस रचना को अच्छा कहूँगा जिसे पढने में कम से कम मुझे कभी अपनी समझ में कमतर न लगे. लोग वाह वाह करते हैं तो इसका तात्पर्य होगा कि मैं ज्यादा लोगों के समझ के बराबर सोचता हूँ, नहीं तो कम लोगों के. अब यह अलग बात है कि जिन कम लोगों के साथ मेरा मानसिक तारतम्य बैठता है वे स्तर से ऊपर हैं या नीचे. और इसके लिए कोई फुट-मीटर वाला डंडा तो है नहीं कि लोग निर्णय ले लेंगे कि अमुक ज्यादा समझ वाला है और अमुक कम.
तो मैंने एक प्रयोग किया अपनी ही रचनाओं के ऊपर. उन रचनाओं को जो कुछ समय पहले लिखी थी. जिस पर से मेरी और अन्य पाठकों की दृष्टि नहीं रही, फिर से पढ़ा. कई बार लगा “मजा नहीं आया”, कई बार लगा यह इससे ज्यादा अच्छा हो सकता था. और अच्छे शब्द का प्रयोग या पंक्तियों की संरचना की जा सकती थी. अन्तर्निहित भाव को और भी प्रबल बनाया जा सकता था. पर एक बात पर दुःख हुआ कि अभी तक कभी यह नहीं लगा कि हाँ “यह हुई ना बात”.
ये बातें मैं साहित्य के ज्ञान होने की वजह से नहीं कर रहा, वह तो मुझे बिलकुल नहीं है. यह मेरे प्रयोग का फल है. आप इस प्रक्रिया को साहित्य में क्या कहेंगे यह मुझे नहीं पता. पर मैं जानना चाहता था कि यदि आप ने कभी अपनी पुरानी रचनाओं का पुनरावलोकन किया हो तो क्या आपको अपनी ही रचना अच्छी लगी? यदि हाँ तो कितनी बार? क्या उसे प्रतिशत में बताया जा सकता है? कैसा महसूस हुआ आपको?
बताइए ना, आप भी अपने अनुभव.
मैं एक प्रयास कर रहा हूँ उन रचनाओं और उनमे सुधर की एक सूची बनाने की, जो मुझे आज उतने अच्छे नहीं लगते जितना कि लिखते वक़्त लगे थे. भाव आज भी अच्छे हैं पर रचना स्वयं में कमतर लगती है. जैसे कि कुछ छूट गया हो. उसे कभी बाद में प्रस्तुत करूंगा.
पुरुषों के लिए सुखी जीवन के १० उपाय
Apr 17th
१) पत्नी बहुत बोलती हो तो? पढ़ने की आदत डालें.
२) पत्नी यदि सुबह की चाय नियमित नहीं बनाती हो तो? चाय बनाना सीख लें.
३) रोज रोज की मगजमारी न कर के पुरी तनख्वाह पत्नी के हाथ में दे देनी चाहिए. हाँ अपना खर्चा काट के ![]()
४) बच्चों के स्कूल की डायरी बच्चों की माँ को ही पढ़ने दें.
५) मकान-मालिक से कब क्या कहना है, पत्नी को स्वयं कहने दें.
६) दफ्तर पहुँचने के बाद शाम लौटने से पहले घर फ़ोन ना करें.
७) बच्चों को डांटे नहीं उसकी माँ से शिकायत करें.
८) उसकी सहूलियत के सामान जैसे कि वाशिंग मशीन, फ्रीज, वाक्यम क्लीनर जरूर खरीद दें. टी वी होना चाहिए (आप ही के काम आएगा).
९) नियमित रूप से उसे कहें की मैं तुम्हे प्यार करता हूँ और तुम बहुत सुन्दर दिख रही हो (डेली नहीं सप्ताह में एक दो बार).
१०) पत्नी यदि पति को नौकर समझे तो पति क्या करे? दो चार घर और पकड़ लेना चाहिए.
इन सब के ऊपर एक नियम ० (शुन्य) है जो हमेशा काम करती है.
०) कोई उपाय काम न करे तो सिर्फ और सिर्फ किस्मत को दोष देना चाहिए.


आपने कहा