एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
Archive for May, 2009
ख़त्म तो नहीं होंगे ना, वही बहुत है
May 29th
बंगलोर से गाँव जाने का रास्ता ५४ घंटे का है (यदि भारतीय रेल के समय सारणी पर विश्वास करें तो) पर मुझे कुल ६२ घंटे लगे. इसका पूर्वानुमान होने की वजह से मैं दो किताबें ले कर चला था. पर गर्मी, ट्रेन में पैंट्री कार का न होने की वजह से खाद्य पदार्थ व चाय पानी का अभाव, और अकर्मण्य हो कर न सो पाने की बुरी आदत से ग्रसित होने के कारण दोनों को मुगलसराय से पहले ही चाट डाली. More >
पागल हूँ, बेवकूफ नहीं
May 29th
एक बार पागलों को ले कर जाने वाली एक गाड़ी के ड्राईवर को रास्ते में ही दीर्घ शंका की तत्काल आवश्यकता महसूस हुई. वह गाड़ी खड़ी कर निपटने चला गया. लौट कर जब आया तो उसके होश उड़ गए, देखता है कि किसी ने एक चक्का निकाल लिया. अब ड्राईवर बेचारा सर पकड़ कर बैठ गया. उसके पास स्टेपनी तो थी पर नट्स नहीं थे. वह पागलों को छोड़ कर कहीं जा भी नहीं सकता था और न ही उनमे से कोई उसकी मदद कर सकता है. बात पुराने ज़माने की है जब मोबाइल की छोडिये टेलीफोन भी सज्जनों की तरह विरले ही दिखते थे.
बहुत देर तक जब गाड़ी न चली तो एक पागल ने पूछ ही लिया, “क्या हुआ?”
हालाँकि उसे जवाब देने का कोई फायदा नहीं दिखता था फिर भी कोई तो समस्या पर बात करने वाला है सोच कर बोला “गाड़ी एक चक्का कोई निकाल ले गया, स्टेपनी है पर नट्स नहीं हैं. अब इसे लगाऊं तो पहुंचूं.”.
इस पर पागल बोला “तो इसमें ऐसे सर पकड़ कर क्यों बैठे हो? चारों चक्के से एक एक नट निकाल कर चौथा चक्का लगा लो”.
ड्राईवर खुशी से उछला और पागल की तारीफ में बोला “अरे वाह, लोग खामखा तुम्हे पागल कहते हैं तुमने कितने अकल की बात की है”.
पागल बोला “पागल हूँ, बेवकूफ नहीं”.
ऐना कियै छैक
May 29th
भोर भेल,
ओ तैयार भेलाह.
दुपहरिया भेल,
ओ बिदा भेलाह.
सांझ भेल,
ओ पहुँच गेलाह.
राति भेल,
वो भेंट भेलाह.
भोर भेल,
ओ हेरा गेलाह.
सुनालियैक,
हमर बियाह भय गेल. More >
अश्लील
May 27th
एक पुरुष का चॉकलेट बन जाना
एक लड़की का उसके नितम्ब का टुकडा खाना
कहलाता है अश्लील
उसी बदबू छुपाने वाली तरल के प्रचार में
जब गोते लगाती है एक स्त्री मन ही मन अभिसार में
तो वह नहीं कहलाता अश्लील
फिर लगाता है वही तरल एक पुरुष समंदर किनारे
लड़कियाँ अन्तरंग वस्त्रों में चली आती हैं दौड़े दौड़े
तो नहीं कहलाता अश्लील
स्त्री को निहारना इतना सहज है
कि हम विज्ञापन बनाते हैं सिर्फ उन्ही को देखने के लिए
हम सर हिलाते हैं जब वह पूछती है “छुओगे?”
देखिये नोकिया के सपने : मोर्फ कांसेप्ट
May 27th
देखिये कैसे नोकिया नैनोस्केल टेक्नोलॉजी का प्रयोग मोबाइल की दुनिया में करने के सपने देख रही है.
http://www.nokia.com/about-nokia/research/demos/the-morph-concept/video


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