परिचर्चा

एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

ख़त्म तो नहीं होंगे ना, वही बहुत है

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बंगलोर से गाँव जाने का रास्ता ५४ घंटे का है (यदि भारतीय रेल के समय सारणी पर विश्वास करें तो) पर मुझे कुल ६२ घंटे लगे. इसका पूर्वानुमान होने की वजह से मैं दो किताबें ले कर चला था. पर गर्मी, ट्रेन में पैंट्री कार का न होने की वजह से खाद्य पदार्थ व चाय पानी का अभाव, और अकर्मण्य हो कर न सो पाने की बुरी आदत से ग्रसित होने के कारण दोनों को मुगलसराय से पहले ही चाट डाली. Read the rest of this entry »

पागल हूँ, बेवकूफ नहीं

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एक बार पागलों को ले कर जाने वाली एक गाड़ी के ड्राईवर को रास्ते में ही दीर्घ शंका की तत्काल आवश्यकता महसूस हुई. वह गाड़ी खड़ी कर निपटने चला गया. लौट कर जब आया तो उसके होश उड़ गए, देखता है कि किसी ने एक चक्का निकाल लिया. अब ड्राईवर बेचारा सर पकड़ कर बैठ गया. उसके पास स्टेपनी तो थी पर नट्स नहीं थे. वह पागलों को छोड़ कर कहीं जा भी नहीं सकता था और न ही उनमे से कोई उसकी मदद कर सकता है. बात पुराने ज़माने की है जब मोबाइल की छोडिये टेलीफोन भी सज्जनों की तरह विरले ही दिखते थे.

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बहुत देर तक जब गाड़ी न चली तो एक पागल ने पूछ ही लिया, “क्या हुआ?”

हालाँकि उसे जवाब देने का कोई फायदा नहीं दिखता था फिर भी कोई तो समस्या पर बात करने वाला है सोच कर बोला “गाड़ी एक चक्का कोई निकाल ले गया, स्टेपनी है पर नट्स नहीं हैं. अब इसे लगाऊं तो पहुंचूं.”.

इस पर पागल बोला “तो इसमें ऐसे सर पकड़ कर क्यों बैठे हो? चारों चक्के से एक एक नट निकाल कर चौथा चक्का लगा लो”.

ड्राईवर खुशी से उछला और पागल की तारीफ में बोला “अरे वाह, लोग खामखा तुम्हे पागल कहते हैं तुमने कितने अकल की बात की है”.

पागल बोला “पागल हूँ, बेवकूफ नहीं”.

ऐना कियै छैक

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भोर भेल,
ओ तैयार भेलाह.
दुपहरिया भेल,
ओ बिदा भेलाह.
सांझ भेल,
ओ पहुँच गेलाह.
राति भेल,
वो भेंट भेलाह.
भोर भेल,
ओ हेरा गेलाह.
सुनालियैक,
हमर बियाह भय गेल. Read the rest of this entry »

अश्लील

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एक पुरुष का चॉकलेट बन जाना
एक लड़की का उसके नितम्ब का टुकडा खाना
कहलाता है अश्लील

उसी बदबू छुपाने वाली तरल के प्रचार में
जब गोते लगाती है एक स्त्री मन ही मन अभिसार में
तो वह नहीं कहलाता अश्लील

फिर लगाता है वही तरल एक पुरुष समंदर किनारे
लड़कियाँ अन्तरंग वस्त्रों में चली आती हैं दौड़े दौड़े
तो नहीं कहलाता अश्लील

स्त्री को निहारना इतना सहज है
कि हम विज्ञापन बनाते हैं सिर्फ उन्ही को देखने के लिए
हम सर हिलाते हैं जब वह पूछती है “छुओगे?”

देखिये नोकिया के सपने : मोर्फ कांसेप्ट

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देखिये कैसे नोकिया नैनोस्केल टेक्नोलॉजी का प्रयोग मोबाइल की दुनिया में करने के सपने देख रही है.

http://www.nokia.com/about-nokia/research/demos/the-morph-concept/video

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