बात सन् ९७ की है. मैं उस दौरान अपनी पहली नौकरी में था. घर से दफ्तर तक आने-जाने के लिए ऑटोरिक्शा ले लिया करता (इसका भी एक कारण है कभी इत्मीनान से बताऊँगा) . फिलहाल तो आपको यह बता दें कि पटना में बहुतेरे ऑटोरिक्शा का पिछ्वारा काट कर तीन और लोगों के बैठने की जगह बना दी जाती है. वैसे तो यह गैर-कानूनी है पर उस पर आप ध्यान न दें. क्योंकि हमारा मानना है कि ऐसे मनाही वाले कानून एक खास सरकारी कर्मचारी वर्ग के बीवियों की फरमाईशें पूरी करने के लिए बनाई जाती हैं.

खैर! तो मैं कह रहा था कि, कुल जमा के ऑटो में तीन बीच में, तीन पीछे में और दो चालक लोग को सहारा देने के लिए उसके आजू-बाजू में बैठा करते थे. जगह की थोड़ी तंगी होती थी पर काम चल जाता था. पर यदि किस्मत से कोई खाते-पीते घर का खाता-पीता बन्दा या यदि यात्रा अच्छी बनी हो तो बन्दी बैठ गयी तो तंगी बढ़ जाया करती थी.

ऐसे ही एक दिन जब लोग बैठ ही रहे थे, आख़िरी सवारी एक ताऊ जी निकले. उन्हें बैठने में थोड़ी तकलीफ हुई, सड़क पर भी घर से ऑटो तक आते हुए उनको भीड़ का सामना करना पड़ा था. और उनके मन का विसाद निकला पड़ा और कह पड़े “आबादी कितनी बढ़ गयी है”.

झल्लाए तो सब थे. यह तो रोज का काम था. पर मुझसे रहा न गया और हठात पूछ बैठा “ताऊ गलती किसकी है”?  ताऊ के दुर्योग से उस दिन बाकी सभी युवा ही थे. हठात सभी ठठा कर हंस पड़े. फिर अगले पांच किलोमीटर का सफ़र सबने चुप-चाप गुजारा, पर सबों की दबी-दबी मुस्कराहट और ताऊ का झेंपना साफ़ झलक रहा था.

हाँ आपको बता दूं कि वे हमारे ताऊ रामपुरिया तो बिलकुल नहीं थे, हो भी नहीं सकते नहीं तो वे मुस्कुरा रहे होते और हम झेंप रहे होते.