जवानी के दिनों में लगभग हर लड़का किसी न किसी अदाकारा का दीवाना हो जाता है. मैं उर्मीला का था. पर दिल को पूरा यकीन था की उर्मीला तो हमारे लिए चाँद है. और यदि चाँद मिल भी जाये तो उसे रखोगे कहाँ? मान लो वह कह भी दे कि मैं तुम्हारे दिल में रह लूंगी. पर दिल में खाना-पीना, सोना, गाना, नाचना और नहाना-धोना, कपडे सुखाना, सामान रखना, गाड़ी पार्क करना वगैरह? ना बाबा ना, रखूंगा तो घर ही.

फिर हमने ख्याल किया कि पूरी की पूरी उर्मीला न रख कर उसकी छवि दिल में बसा लेंगे. पर हुआ यूँ कि हम आ गए नौकरी में और हमारी प्यारी उर्मीला दिल में अन्दर ही अन्दर बहुत अन्दर दबती चली गयी. उसके ऊपर आ गया था महीने का किराया, मोटरसाईकिल की किश्तें, बनिए का बिल आगे की पढाई-लिखाई के खर्चे वगैरह.

फिर हमारी माता-राम को यह समझते देर नहीं लगी कि अब मुझे उर्मीला की जगह यदि कोई और देखभाल (परेशान) करने वाली कुछ साल और न आयी तो फिर कहीं मैं भी वाजपेयी जी से प्रेरित न हो जाऊं. सो चारों और जासूस भेजे और ढूंढ ही लिया हमारे वर्त्तमान पत्नी को. (यह भी प्यारी कहानी है, लिखूंगा जीवनी में :) )

अब आप पूछोगे कि अचानक से उर्मीला की याद क्यों आ गयी? तो हुआ यह कि मैं अभी अभी एक नुक्कर पर चाय पीने गया और वो दिख गयी. फिर मुझे याद आया कि उर्मीला अभी तक कुंवारी है. और मन में पश्चाताप की भावना आ रही है कि कहीं वह तपस्या तो नहीं कर रही. वैसे भी उसकी योग मुद्राएँ बहुत गंभीर होती हैं. रंगीला की उसकी मुद्राएँ तो बाबा रामदेव को कभी भी पछाड़ दे.

अब उर्मीला दिल में इतनी अन्दर घुसी हैं कि ढूंढें नहीं मिलती, और मिलेगी भी कैसे उसके ऊपर बाकी जिम्मेदारियों और दो बच्चों के साथ आजकल एक महिला बैठी दिखती है, जिसे लोग बहुत ही आदर से मेरी पत्नी कहते हैं.

बेचारी उर्मीला तक यदि कोई यह सन्देश पहुंचा दे कि मैं अब उसके काम का न रहा. ताकि वह भी किसी का, भूतों के कॉमेडी फिल्में बनाने वाले का ही सही, हाथ पकड़ ले.