about 1 year ago - 4 comments
बात मेरे अन्तर-स्नातक की पढ़ाई शुरु करने के तुरंत बाद से शुरु होती है. नया नया कॉलेज वह भी मॉर्निंग. मेरे दो दोस्त भी बन गये थे. अच्छी जमती थी हमारी. गर्मी से लेकर सर्दियों तक सुबह सुबह पसीने में नहाते, बारिश में भींगते या ठिठुरते हुए कालेज जाना अभी भी याद आता है. बस
about 2 years ago - 3 comments
रोज देखता हूँ कुछ कुछ रेंगते हुए लोग और उनसे लिपट कर रेंगते हुए कुछ और लोग. दिन रात बस उन्हीं से पाला पड़ता है मुझे मैं भी उनसे डरकर अब रेंगना सीख रहा हूँ. मुझे याद आता है वो दिन भी जब जोड़ से पत्थर उठा कर फेंका था उस कीचड़ उछाल कर जाती
about 2 years ago - 1 comment
मुझे चाहिये एक अच्छा सा रोजगार क्योंकि मैं अच्छा पैसा कमाना चाहता हूँ चाहिये एक अच्छी गाड़ी और एक अच्छा घर एक अच्छी सी पत्नी और अच्छे बच्चे भी और इससे अच्छा क्या होगा मेरे लिये? यूँ तो मुझे तब भी अच्छा लगता है जब कोई बाजी लगाता है देश के लिये या हटाता है
about 2 years ago - No comments
रात बहुत अंधियारी थी और इन्द्रदेव का मूड अलग था नही जानता मैं अज्ञानी कि प्रसन्नता या कुछ कारण और. झम झम करके रही नाचती सुकुमारी बरखा सारी रात. बिजली रानी के वियोग में नही सूझते हाथों को हाथ. बात राज की बतलाऊंगा अब हँसना ना तुम हे प्रिय सिरमौर. कल रात स्वामिनी मेरे घर
about 2 years ago - 1 comment
जय होगी हमारी निश्चित ही पर निर्णय लेना होगा यह कि कितना स्वार्थ समोचित है. है नही दोष निज उन्नति में जब तक न पाप समाहित हो करता यह जन-कल्याण ही है. यदि शिक्षा एक साधन हो बस कुटुम्ब पालन का तो इतर कहाँ हम पशुओं से. हैं गिले व शिकवे सबको यहाँ और दोष
about 2 years ago - 10 comments
कितना अच्छा होगा जब एक ही किताब पढ़ायी जायेगी दिल्ली से सुदूर गाँव तक. बिजली का क्या है दिल्ली में भी कायम नही रहती. रास्ते में गड्ढे के लिये भी जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना. हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये कहीं और जाने की जरूरत नहीं. राख़ आँखों मे उड़ कर
about 2 years ago - 2 comments
लगे आपको “अप्रतिम” वह शब्द कहाँ से लाऊँ मैं. स्वरचित अज्ञान शिविर में जब तड़प रहा हूँ हर दिन मैं. अतुल्य लगे जो पाठक को और जलाये दीप तिमिर में वह कविता कैसे बनाऊँ मैं. शब्द नहीं हैं पास मेरे भाव गये कब के संग छोड़. लिखना नहीं चाहता हूँ मैं पर जब दबते हाथों
about 2 years ago - 5 comments
एक लड़की पर तेज़ाब डाला गया. दूसरी जींस पहन कर घूम रही थी. तीसरी ने अपनी माँ की हत्या कर दी. चौथी को ससुराल में जला दिया गया. पाँचवीं को सेना मे भरती किया गया है. छठी ने अपने पति को मार दिया. सातवीं ने पति के साथ जान दे दी. आठवीं मेरे साथ ही
about 2 years ago - 4 comments
बेटों ने फिर कहा “पिता जी यूँ तो इस विषय पर बात करने की जरूरत ही नहीं है, पर आप चाहते हैं तो हम सुबह बात करेंगे, हम बहुत थके हुए हैं”.
about 2 years ago - 1 comment
कुछ दिनों से सोच रहा था क्या क्या नहीं किया कितने सालों से. कि हल्के से यह दिल भींचा आंख मली कि समझ ना ले कोई कि वह कचरा नहीं था, दो बूँदें थीं. अब यह बूँदें यूँ ही आती हैं. वैसे नही, जैसे आते थे गिरने पर आंखों में सरसों के कीड़े. अब नही
about 1 year ago
blackberry मे हिन्दी सम्बन्धि जान्कारी हेतु सम्पर्कः
shailuxp@gmail.com
M-090398 00824; 09893154109 ; 9893942939; 9329050073