एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
भरोसा
आज बहुत तकलीफ हो रही है, बहुत दिनों से एक सपना देखता था कि अपना एक घर बनाऊँगा. पर फ्लैट नहीं में नहीं बसूँगा. मैं कभी भी कबूतरों की तरह नहीं रहना चाहता. पर जितनी बाद कदम बढ़ता हूँ एक डर पाँव पीछे खींच लेती है. बेबस सा महसूस होता है और तकलीफ होती है यह सोच कर कि हमारा मुल्क ऐसा क्यों है?
आर्थिक रूप से इतना सक्षम हूँ कि मैं यहाँ एक छोटा सा घर बना सकता हूँ, जिसमे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रह सकता हूँ, पर डर लगता है. मैं जहाँ रहता हूँ, आये दिन किसी के यहाँ ताला टूटने की, किसी अधेड़ या किसी अकेली महिला की किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा हत्या की खबर अखबार में आती रहती है. हर अनजान चेहरे से डर लगता है, और जाने पहचानों से भी दूरी बना कर रखनी पड़ती है. पत्नी और बच्चों को हिदयात दे रखी है कि चाहे जो भी हो, जब मैं या गार्ड घर पर नहीं हैं तो किसी के लिए भी दरवाजा मत खोलो.
क्यों हमें डर लगता है भीड़ में भी और भीड़ से बाहर भी? मैं कहाँ जाऊं? कोई मुझे ऐसी जगह बता दो हिन्दुस्तान में जहाँ मुझे इंसानों का डर न हो.
फिर भी अभी मेरा सपना बाकी है, एक बार दिल ने भरोसा दिला दिया कि अमुक जगह पर रहा जा सकता है तो कोशिश जरूर करूंगा. तब तक कुछ इस तरह सोचता हूँ….
अभी हिम्मत नहीं टूटी है मेरे दोस्त
कुछ तो अच्छे लोग होंगे जहान में
हम यही सोच कर घर बना लेंगे कि
रहते हैं वही लोग बगल के मकान में…
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on February 27, 2009 at 5:31 pm, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

