मेरे एक भ्राता हैं, अंगरेजी में कजिन कह लीजिये. बहुत ही बेबाक व्यक्ति हैं. उनके पितामह जो मेरे पितामह के सहोदर भी थे, मैथिली में बहुत ही सम्मानित लेखक व कवि रहे हैं. साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित भी हुए. उनकी एक कविता मेरे इन भ्राता को समझ में नहीं आयी और इसी बात पर घर में ही आलोचना शुरू हुई.
आलोचना यह थी की कवितायेँ ऐसी होनी चाहिए कि पढने वाले को सीधे समझ में आ जाये. दूसरी तरफ से हम दोनों के चाचा जी व स्वर्गीय पितामह के ज्येष्ठ पुत्र ने तर्क दिया कि कविता ऐसी होनी चाहिए जिसमे कोई गूढ़ अर्थ छिपा हो.
प्रत्युत्तर में तर्क, या कुतर्क जो भी कहिये, यह था कि यदि इसी को कविता कहते हैं तो वह एक महाकाव्य लिख सकते हैं जिस में सैकडों बाद सिर्फ ठक ठक लिखा होगा. पढने वाला उनका अर्थ लगाते रहे जैसे भ्रष्टाचार पर प्रहार “ठक-ठक”, दहेज़ प्रथा पर प्रहार “ठक-ठक”. इसी तरह से वो जो भी अर्थ निकाल सके.
अभी अभी काल कविता पढी तो उस ठक-ठक महाकाव्य की याद आ गयी.
prithvi
on Aug 6th, 2009
@ 10:58 pm:
सही कहा है..
वैसे नयी जगह पर स्वागत है और उम्मीद है कि यह स्थानांतरण अधिक प्रभावी होगा. अनुभव हमें भी बताइगा.
Ashton Maiers
on Sep 6th, 2010
@ 12:34 pm:
So, we’ll go back to the question.