एक मौलिक पोस्ट
लोग एक दूसरे का नाम लेकर लिखते हैं. मैंने भी लिखा. अभी तक उसकी लीपा-पोती नहीं हुई है. शायद कालांतर में हो या कभी ना हो और लोग अपने अपने मन का मैल या तो दिल में संजो कर रख लें या किसी पोस्ट में उल्टी कर दें या वैसे ही भूल जायें, या यह भी हो सकता है कि कान पर जूँ ही न रेंगा हो. हो सकता है कि मारे ज्ञान और अनुभव के कारण बाल नहीं होंगे तो जूँएं भी नहीं होंगी.
उस पोस्ट पर से दो टिप्पणियों को मैंने डिलीट कर दिया क्योंकि वह मुझे बहस की मर्यादा से एकदम परे लगा. पर मैं उन सब लोगों से जिन्हें इससे कष्ट पहुँचा हो क्षमा माँगता हूँ, क्योंकि यह निश्चित है कि मेरा उद्देश्य कभी भी किसी को दुःख पहुँचाने का नहीं था.
इधर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जब सोच में मौलिकता का अभाव हो या मौलिक पोस्ट लिखने की क्षमता ही न हो या लेखक विषयाभाव से घबड़ा गया हो तो अकबका कर कुछ भी लिख जाता है.
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मैं सन २००६ में पहली बार लंदन गया था. शुरु शुरु में एक डिपार्टमेंटल स्टोर से तैयार खाना खरीदता था. एक दिन चावल और मुर्गी का शोरबा बना था. जब वह खाना मेरे लिये पैक कर रहा था तो मैंने उससे आग्रह किया “Put some more gravy”. उधर से जवाब आया “Say Please!”, मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर से कहा “Put some more gravy please.” उत्तर में सुनने को मिला “My pleasure!”. मेरे लिये यह एक प्राईमरी की छूटी हुई शिक्षा थी जिससे मैं शुद्धतः आंचलिक भाषायी स्कूल में पढ़ने के कारण वंचित रह गया था. बाद में सीखी तो अवश्य पर व्यवहार में नहीं ढाल पाया था.
इसी घटना को मैंने अपने एक मित्र को भी बताया तो उसे मेरी गलती नहीं दिखी वरन उसने गोरे-काले के इशू पर अपनी झल्लाहट प्रकट कर दिया. अमूमन हम ऐसा तब करते हैं जब किसी घटना के दोनों पहलूँओं को नहीं देख पाते या कहिये कि अपने या अपने प्रिय व्यक्ति की तरफ कोई भी नकारात्मक बात नहीं देख पाते.
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मेरी तरफ से एक फोटो. यह एक तरह की फोटोग्राफी होती है “Camera Toss”. इसमें Camera को क्लिक कर के हवा में उछाल दिया जाता है और फिर एक अजीब सी तस्वीर जो कि प्रक्रिया दुहरायी भी जाये तो वही तस्वीर नहीं बनती. ठीक उसी तरह जैसे उलूल जुलूक खयाल भी दुबारा उसी स्वरूप में नहीं आते. लोग इस को कला कहें या संयोग यह तो देखने वाले पर निर्भर करता है.
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मेरे पिता बहुत ही अनुशासन प्रिय व्यक्ति हैं. पर उम्र के साथ उनके अनुशासन के नियम बदलते रहे हैं. जो नियम मेरे लिये अकाट्य थे वही नियम मेरे बच्चों के लिये अनुपस्थित हैं. परिपेक्ष्य बदल गया है मैं उनकाअ कर्तव्य था पर मेरे बच्चे उनके लिये वात्सल्य प्रकट करने का अंतिम अवसर हैं. मुझे हमेशा सिखाया जाता था कि जिस चीज को जहाँ से उठाओ उसे वापस वहीं रखो. एक रात मेरे पिता ने तौलिया का प्रयोग करने के बाद अपनी मच्छरदानी के ऊपर रख दिया. सुबह मैं जब स्कूल जाने के लिये तैयार हो रहा था तो नहाने के बाद भींगे हुए उस तौलिये को वापस उनकी मच्छरदानी पर रख दिया. उसके बाद जो हुआ वह भारतीय बच्चों को बताने की जरूरत नहीं समझता. पर मैंने उसके बाद से उनके दिये किसी भी नियम का अक्षरशः पालन बंद कर दिया.
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This post has 6 comments
September 24th, 2009
बहुत ही मर्यादित लेख ..पढ़ कर प्रसन्नता हुई.
गलतियाँ होतीं ही रहती हैं लेकिन उनको स्वीकारना और नहीं दोहराने कोशिश करना ही श्रेष्ठता का द्योतक है….
इनदिनों ब्लोग जगत की हवा थोडी विपरीत बह रही है…लिकं विश्वास हैं की सब ठीक हो जाएगा…..
आपकी बातों से मुझे भी मेरे महा-अनुशासन प्रिय पिता जी याद आ गए जिनके सारे अनुशासन किसी ताख पर धरे नज़र आते हैं जब वो मेरे बच्चों से मिलते हैं…..
हा हा हा हा
September 24th, 2009
बहुत खूबसूरत प्यारी सी पोस्ट्! आभार इसे लिखने के लिये।
September 29th, 2009
छोटे-छोटे संस्मरणों से बड़ी बातें कह दी। अच्छी और रोचक पोस्ट।
कैमरा-टॉस एक बार जरूर करना चाहूंगा, हो सकता है कि कैमरा दोबारा करने लायक ही ना बचे। अच्छा लगा इस बारे में जानकर।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
October 5th, 2009
आपके संस्मरण सहज ही ज्ञानवर्धन कर रहे हैं.
आजकल हिंदी ब्लॉगजगत में कुछ अवांछित बहस सा हो रहा है. बकौल कुछ ब्लोगरों के लिए यह नए विषय को जन्म देता है. परन्तु हर किसी को उत्तर या प्रतिक्रिया देना भी बस के बाहर है.
November 14th, 2009
Baba,
We feel very pleasure with your blogs.
thanks and hope for your new blog.
Manoj
December 19th, 2009
कौतुक जी,
आप कैसे हैं. बहुत दिनों से मिलना नहीं हुआ है.
सुलभ