बड़ी तमना है दिल में अपने गाँव-समाज के लिए कुछ करने की. वास्तव में मैं अपने गाँव, जिले और राज्य को समृद्ध देखना चाहता हूँ. और उसका सीधा-सीधा उपाय यही दिखता है कि सबसे पहले मेरे जैसे लोगों, जिनको भविष्य की जरूरत और रास्ते थोड़े बहुत दिखते हैं, को सड़क पर आना होगा. इसे क्रांति कहें या कुछ और, लेकिन रास्ता एक ही है – “सड़क पर उतरो”. हाथ पैर गंदे करो और हर चीजों को दुरुस्त करो.

तो मुश्किल क्या है? इरादे हैं, हौसले हैं, रास्ते हैं और मैं भी हूँ.

मुश्किल यह है कि मैं यदि अभी चल पड़ा तो मेरे ऊपर आधारित दस जिंदगियां कहाँ जायेंगी? उनको भूखा और उनके भविष्य को आग में झोंक कर तो अन्याय ही करूंगा ना? जिसे जन्म दिया है उसकी चिंता भी तो मेरा ही कर्त्तव्य है. उनको छोड़िए मुझे भी तो आजीविका की जरूरत होगी.  जो काम मैं करना चाहता हूँ उसमे भी तो पैसे लगेंगे. कैसे होगा? खाली पेट, नंगे बदन तो काम न होगा. फिर करें क्या? मेरे जैसे व्यक्ति यदि कुछ बड़ा करना भी चाहें तो कैसे करें. 

बहुत सोच विचार के बाद एक रास्ता निकला है, समय लगेगा, पर संभव लगता है.

आज से दस साल बाद मेरी पत्नी हमारे घर की जिम्मेदारी उठाने लायक हो जायेंगी. अभी मैं ३५ का हूँ तो ४५ के आस पास जब बच्चे उच्च विद्यालय से बाहर निकल चुके होंगे और दुनियादरी समझने लायक हो जायेंगे, तो मैं पत्नी को घर बार की जिम्मेदारी दे कर समाज की जिम्मेदारी ले सकता हूँ.

बहुत अजीब लगता है इतना कायराना तर्क देते हुए. पर शायद मेरी ही जैसी हालत मेरे हम-उम्रों की है जिनकी अपने देश को बहुत जरूरत है. सबकी मजबूरी भी एक सी होगी. मैं इसीलिए अपने विचार को पोस्ट की शक्ल में डाल कर उनके दिल की बात कहना चाहता हूँ.

मैं चाहता हूँ कि मैं और मेरे हम-उम्र लोग यह स्वीकार करें कि हमारी हमारे समाज को बहुत जरूरत है और हम जितनी जल्दी पारिवारिक जिम्मेदारी निभा कर समाज के लिए तत्पर हों उतना ही सुखी जीवन हमारे बच्चों का होगा. सिर्फ महंगी और ऊंची शिक्षा दिला देने या पैसा कमा कर रख देने से उनका जीवन सुखी नहीं होगा. उन्हें एक चुस्त-दुरुस्त सरकारी तंत्र और मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर भी चाहिए, और भी बहुत कुछ चाहिए होगा.

मेरी एक गुजारिश अपने बुजुर्गों से भी है. जो अवकाश प्राप्त लोग हैं, उनमे बहुतों को भगवान ने ज्ञान, साधन और  स्वास्थ्य सब दिए हैं. जिनसे वे समाज में बदलाव ला सकते हैं. मेरा उनसे इतना आग्रह है, आपने भी हमारी तरह सपने देखे होंगे. अपने लिए, अपने बच्चों के लिए, अपने घर के लिए, अपने समाज के लिए, अपने राज्य फिर अपने देश के लिए.  तो उठिए सोचिये कि उनमे से कितने सपने आपके पुरे हो गए और कितने बाकी हैं?

अच्छी पढाई कर ली. बच्चों को पढ़ा दिया, उनकी शादियाँ करवा दी, घर-बार भी बनवा दिया. और अब? कहीं आप इंतजार तो नहीं कर रहे? अपनी मृत्यु का?

वैसे तो अभी भी जहाँ पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों में टकराव नहीं आता वहाँ जिम्मेदारी से मुख नहीं मोड़ता हूँ मैं. फिर भी मैं वचन लेता हूँ अपने आप से कि मैं अपने परिवार की मूलभूत आवशयकता पूरी कर के अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करना शुरू कर दूंगा.

यदि आप अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह कर चुके तो चलिए आपके घर के बाहर का सपना आपको बुला रहा है.