एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
राह चलते बच्चों को लिफ्ट न दें
बंगलोर में आवासीय क्षेत्रों में आपको बच्चे स्कूटर-मोटरसाइकिल वालों से लिफ्ट मांगते दिखाई दे जायेंगे. शायद ऐसा अन्य शहरों में भी हो. शायद आप में से कुछ लोग सहृदय होकर उन्हें लिफ्ट दे भी देते होंगे.
पर शायद आपने इस पहलू पर गौर ही न किया होगा कि आप कितना बड़ा जोखिम अपने ऊपर ले रहे होते हैं. यदि दुर्योग से आपकी गाड़ी किसी दुर्घटना का शिकार होती है और उसमें वह बच्चा थोड़ा भी आहत होता है या न भी हो और पुलिस आ जाये. और आपसे पूछे कि वह बच्चा कौन है, तो आपको पता है आपकी क्या दशा होगी?
आप पर सीधे-सीधे अपहरण का मामला बन सकता है. फिर आपकी सारी की सारी सहृदयता धरी की धरी रह जायेगी. और जो काम आप छोटी सी भलाई सोच करने चले होंगे वह आपके परिवार की तबाही का कारण बन जायेगी.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 6, 2009 at 11:21 am, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
हर चीज के दो पहलू है कल किसी का लेख पढ़ रहा था जिसमे उन्होंने बताया किसी सर्दियों के रात के अँधेरे में किसी ने उन्हें लिफ्ट देकर मुश्किलों से बचाया .तबसे वे अक्सर लिफ्ट मांगने वाले के आगे रुक जाते है….एक्सीडेंट एक संभावना है…..फिर डर काहे का
about 2 years ago
डॉक्टर!
यदि दुर्घटना न भी हो और यूँ ही यदि आप पर किसी बच्चे के माता-पिता ने अपहरण का आरोप लगा दिया तो आप तो गए काम से. वयस्कों के साथ परिस्थिति बदल जाती है. वहां बरगला कर ले जाने जैसा मुकदमा नहीं बन सकता.
आपने सही कहा की दुर्घटना तो एक सम्भावना है. मेरा आशय यह नहीं कि आप किसी को लिफ्ट न दें. मैं सिर्फ बच्चों को लिफ्ट देने से मन कर रहा हूँ.