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फिर वैलेंटाइन डे
फिर वैलेंटाइन डे
इंतजार कीजिये वैलेंटाइन डे को होने वाले उन घटनाओं का जो हर साल की भांति इस साल भी शायद हमारे संस्कृति रक्षक दुहराएंगे. लड़के लड़कियों को पार्क, मॉल वगैरह से भगायेंगे. कुछ जगह शायद हाथ पाँव भी चले पर अभी तक किसी भी राज्य की सरकार ने शायद इस पर सोचा न हो.
ऐसा नही है की मैं वैलेंटाइन डे का समर्थक हूँ पर विरोधी भी नही हूँ. आज कल इतने सारे डे हैं एक साल में मनाने वाला अगर कैलेंडर में तारीखों को रंगने लगे तो शायद कोई भी दिन सफ़ेद न रह जाए. और उनमे से यही एक डे है जिसका विरोध प्रखर रूप में होता है और वह भी सिर्फ़ कुछ विशिष्ट समूहों के द्वारा. तर्क यह है की यह हमारी संस्कृति को भ्रष्ट करता है. शायद कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि रीति रिवाजों के आड़ में कुकर्म करने वालों की कमी कभी नही हुई. गरवा नाइट्स भी एक ऐसा ही त्यौहार है जिसके बाद अख़बार गर्भपात के आकंडों से भरे होते हैं. पर उनका विरोध संस्कृति के नाम पर नहीं होता. लेख आलेख वगैरह आते हैं पार कभी इसका प्रखर विरोध नही हुआ. ना ही किसी ने इसे निषिद्ध घोषित करने की अपील की. गरवा नाइट्स भी गुजरात से चल कर दुसरे प्रान्तों और फिर विदेशों में ठीक वैलेंटाइन डे की तरह प्रचलन में आया है.
सच मानिये तो गरवा का विरोध जो भी करेगा वह पोपुलारिटी तो बिल्कुल नही कमा पायेगा उल्टा उसकी हालत किसी बर्रे के छत्ते में हाथ डाले हुए बच्चे जैसी हो जायेगी. सेंसेशन तो क्रिएट होगा पार उसका कोई राजनितिक फायदा नहीं होने वाला. परन्तु चर्चे में बने रहने और थोड़े बहुत दकियानुशों का वोट पाने के लिए वैलेंटाइन डे का विरोध करना महंगा सौदा नही है. खाश कर के जब सरकारें एक नपुंसक की तरह बयान देने से ज्यादा कुछ नही कर सकती. आजतक किसी भी उपद्रवी को ऐसी सजा नही मिली जो उसके समाज को याद रहे. जो लड़के बस जलने जैसा दुस्साहस करते हैं अगर उनसे एक बस की कीमत अदा करवा ली जाए तो शायद दूसरा कोई भी ऐसी हिम्मत नही करेगा.
इन लोगों को कोई नैतिक उद्देश्य नही चाहिए. जब तक कठोर कानून बनाकर और उसपर अमल कर के उपद्रवियों को दण्डित नही किया जाता ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी.
कानून बनाना और उसपर अमल करवाना तो एक दूरगामी उपाय है, तत्काल मंगलौर जैसी किसी भी घटना को रोकने के लिए अच्छा होगा अगर राज्य सरकारें इस दिन चौकसी बरते और ऐसे जगहों पार जहाँ युवा वर्ग इकत्रित होते हों की शान्ति बनाये रखने के इंतजामात करे.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on February 2, 2009 at 3:15 pm, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

