एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
हाँ यह मानसकिता का ही सवाल है
अभी अभी डाक्टर कुमारेन्द्र ने लिखा..
http://kumarendra.blogspot.com/2009/04/blog-post_4964.html
हाँ यह मानसकिता ही है. अक्षय कुमार का सरेआम जींस के बटन खुलवाना और एक महिला का स्लीवलेस और मिनी स्कर्ट पहन कर बाजार जाना दोनों एक ही तराजू में नहीं रखे जा सकते. एक महिला एक पुरुष के बटन कुछ अन्तरंग क्षणों में ही खोलती है जिसका सार्वजानिक किया जाना उचित नहीं. उस जींस कंपनी का उद्देश्य भी यही था कि यदि आप यह जींस पहनते हैं तो महिलाएं इस खोलने से अपने आपको रोक नहीं पाएंगी. जबकि किसी महिला का स्लीव्लेश और मिनी स्कर्ट पहन कर घूमना यह नहीं कहता कि आओ मेरे साथ सम्भोग करो.
आप ही की बात को आगे बढाते हुए…
इस से सहज कुछ हो ही नहीं सकता कि आप अपनी कमजोरियों के बदले किसी और के गुण या अवगुण पर दोषारोपण कर दें. मैं इसलिए नहीं गरीब हूँ कि मैं कामचोर और अकुशल हूँ, मैं इसलिए गरीब हूँ क्योंकि कोई मुझसे ज्यादा मेहनती और कुशल व्यक्ति बाजार से एक बड़ा हिस्सा ले जाता है.
ठीक इसी तरह बलात्कारी होते हैं. आप अपनी मानसिक कुंठा को दोष न दे कर महिलाओं के वस्त्र, उनकी जीने की आजादी और उन्मुक्त व्यव्हार और विचार को दोष दे दीजिये. मैंने देखा है लोगों को विक्षिप्त महिलों से छेड़खानी करते हुए, यहाँ तक कि उनका बलात्कार भी होता है. उनमे तो यह बोध भी नहीं कि नग्नता क्या होती है. बूढी औरतों का बलात्कार करने को कौन से कपडों ने उकसाया. बच्चियों का बलात्कार क्यों होता है?
आपने समाज की दोहरे उसूलों वाली व्यवस्था को दोष दिया है जिस से मैं भी थोड़ा बहुत सहमति रखता हूँ. पर महिलाओं के जीवन शैली से आप कुकृत्य करने पर उतारू हो जाते हैं तो दोषी महिलाएं नहीं आप हैं. आप मानसिक रूप से कमजोर हैं और आपको यह नहीं सूझता है कि आप को अपने कुंठित यौन विचारों को कैसे दमित करना है.
एक सीधा सा प्रश्न है एक महिला किसी भी कारणवश आपके सामने नग्न भी हो जाये और वह नहीं चाहती की आप उसे छुएँ तो क्या आप बलात्कार का रास्ता अख्तियार कर लेंगे?
पश्चिम में बलात्कार है या नहीं सिर्फ एक शब्द से निश्चित किया जाता है “सहमति”. चाहे वह दो प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच ही क्यों न हों, यहाँ तक की वेश्याएं भी बलात्कार का शिकार होती हैं. वहां का कानून और समाज एक बात हरेक पुरुष को अवश्य सिखाता है कि किसी भी महिला को बिलकुल न छुओ यदि उस वह “न” कहे या प्रतिरोध करे.
हमारे समझ को यह सीखना होगा कि महिलाओं के साथ रह कर उनके स्वछंदता को देखते हुए हम कैसे अपने आप को संयमित और संस्कृत रखते हैं.
मैं आप से सहमति रखता हूँ कि ऐसी कुंठित मानसकिता वाले लोगों का या तो इलाज हो या इन्हें समाज से अलग कर दिया जाये. पर समस्या यह है कि यदि हम ऐसा करें तो हमारे समाज का बड़ा हिस्सा या तो कला-पानी के लायक है या मानसिक इलाज के. वास्तव में हमें स्वयं को सुधार कर आने वाली संतति को मजबूत और उदार विचारधारा देनी होगी.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 12, 2009 at 11:29 am, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
its nice to read people like you with analytical mind and its good way to caary forward the thoughts
i appreciate
about 2 years ago
व्यक्ति जो कुछ भी करता है उसके लिए वह स्वयम जिम्मेदार होता है। अपने कुकृत्यों और असफलाताओं का कारण बाहर ढूँढना तथा सुकृत्यों और सफलताओं का कारण भीतर ढूँढना मनुष्य जाति की आदिम प्रवृत्ति है। लेकिन यह उचित नहीं है, इस बात का बोध अच्छी शिक्षा और संस्कारों से ही हो पाता है। यही सभ्यता का विकास है जो हमें पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाने का नाम है।
about 2 years ago
“पश्चिम में बलात्कार है या नहीं सिर्फ एक शब्द से निश्चित किया जाता है “सहमति”.”
“सहमति” में ही सारी मति छिपी हुयी है।
about 2 years ago
बलात्कार का कपडों से कोइ सम्बन्ध नहीं है. इसका सम्बन्ध है तो हमारी मानसिकता, हमारी सोच से. जिसकी सोच विकृत है उसके मन में हमेशा विकृत विचार आयेंगे चाहे उसके सामने श्वेत वस्त्रों में ढँकी मां सरस्वती की तस्वीर ही क्यों न हो. अगर आपकी मानसिकता स्वस्थ है तो इस बात से आपको कोइ फर्क नहीं पडेगा की सामने वाली महिला ने स्कर्ट पहना हुआ है या साड़ी.
about 2 years ago
मानसिकता में सबसे पहला सवाल तो ये ही आता है कि किस प्रकार की मानसिकता? चलिए यह सवाल भी बहस शुरू करवा देगा। छोड़िए इसे और चर्चा पर कि क्या एक महिला के नाम पर वह बस देह है? क्यों किसी महिला को बलात्कार करके तोड़ा जाता है? क्यों हम किसी भी महिला के चाल-चलन की परिभाषा उसके कपड़ों से तय करते हैं? क्यों एक महिला अपने आपको कम कपड़ों में अधिक खूबसूरत समझती है? क्यों खूबसूरती दिखाने वाली है तो दिखाती हूँ का घोष करने वाली कथित जागरूक महिलायें अपने कुछ अंगों को छिपाये रहतीं हैं? क्या खूबसूरती वहाँ नहीं है?
मसला ये है कि हम तब तक ईमानदार है ंजब तक कि हमें बेईमानी का अवसर नहीं मिला। हम तब तक महिला हित की बात करते हैं जब तक कि हमें अपने हितों पर आघात होता नहीं दिखता। जींस की बटन खोलना यह कदापि सिद्ध नहीं करता कि एक महिला आपसे संभोग के लिए तैयार होगी। यही मानसिकता का सवाल है। इसी को समझना होगा।
about 2 years ago
जींस की बटन खोलना यह कदापि सिद्ध नहीं करता कि एक महिला आपसे संभोग के लिए तैयार होगी। यही मानसिकता का सवाल है। इसी को समझना होगा।
purush kuchh bhi karey wo maany hi haen
agar aap us video ko dhyaan sae dhaekhae to akshay kumaar nae jab twinkel sae kehaa to usko pehla reactipon naa thaa uska manaa kartaa haath dikhtaa haen
par ab pati keh rahaa haen to kyaa karae ??
maanskitaa wahii haen ki mae purush hun tum maeri patni ho aur agar mae sarae baazar bhi tumko kahun to tumko maeri jeans ka button khonla hi hoga
ab yae kis maansiktaa mae aataa haen isko aap log ek baar video dubaara daekh kar bataaye
about 2 years ago
बलात्कार एक असामान्य व्यवहार है ! और इसके अपने सामजिक जैवीय कारण हो सकते हैं !कभी कभी इन मुद्दों पर बात करते हुए हम विषय निष्ठता का दामन थाम लेते हैं और अपने गर्द गुबार निकालने लगते हैं -आप ने प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखी है मगर यह विषय गंभीर विवेचन की मांग करता है -यौन अपराधों को उनके परिप्रेक्ष्यों में देखना होगा ! बलात्कार बिना काम वासना के भी होते हैं -जिसके पीछे कोई और ही (विकार ग्रस्त ) मानसिकता हो सकती है -जैसे बदले की भावना !
पर हाँ यह अपराध है और अपराधी को दंड मिलना ही चाहिए !
about 2 years ago
आपसे शब्द प्रति शब्द सहमत हूँ ..जिस निश्पक्षता से आपने यह लेख लिखा है, उसके लिए साधुवाद
about 2 years ago
apne ne bahut hi satic point par focas kiya hai.super mind.