एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
क्या एक महिला के नाम पर वह बस देह है?
कुमारेन्द्र जी ने लेख के दूसरे चरण में बहुत से प्रश्न उठाये हैं. कृपया नीचे दिए लिंक पर देखें.
http://kumarendra.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html
मेरा मानना है कि यह बहस का दूसरा चरण होना चाहिए. पहले तो हम यह तय कर लें कि क्या हम यह मान लें कि बलात्कार में महिला कि स्थिति, वस्त्र, आचरण आदि दोषी नहीं हैं, बल्कि बलात्कारी किसी न किसी मानसिक अस्थिरता से पीड़ित था या है?
यदि हाँ तो दुसरे चरण में हमें वह सोचना है जो डॉक्टर कुमारेन्द्र ने उठाया है. “क्या एक महिला के नाम पर वह बस देह है”. मैं इस प्रश्न का दूसरा भाग भी पूछता हूँ कि क्या देह सिर्फ “सो काल्ड” अस्मिता ही है? उस पर प्रहार कर दो, उसे छिन्न भिन्न कर दो तो औरत रहेगी ही नहीं.
महिला के नाम पर वह बस एक देह नहीं है, देह के अलावा वो सब चीजें हैं जो एक इंसान में होनी चाहिए. हमने अपने समाज में उसे मानसिक रूप से इतना कमजोर बना कर उसे उसकी अस्मिता से इतनी जोड़ से बाँध रखा है कि अस्मिता के टूटते ही वह भी टूट जाती है. और यदि वह नहीं टूटती तो हम उसे असामाजिक अलंकार देने में परहेज नहीं करते.
वास्तव में हमारे समाज में जो धारणाएं हैं उन्हें तोड़ना बहुत जरूरी है. मैं “काठ की हांडी” वाली धारना की बात कर रहा हूँ. हमें यह पहले स्वीकार करना होगा कि यदि हम काठ के नहीं हैं तो महिलाएं भी काठ की नहीं हैं. हम जिस मानसिकता की बात कर रहे हैं वह यहाँ छुपी है.
इस से पहले कि हम इस “काठ की हांडी” वाली सोच से ऊपर आयें. एक और स्तिथि ली जाये. मान लें कि हमारे समाज में किसी व्यक्ति के साथ जबरन अनैतिक कुकर्म हो जाये. अब उसकी परिस्तिथि अपने समाज में कैसी होगी? पुरुष और महिलाएं दोनों उससे सहानुभूति तो दिखायेंगे साथ ही उस से पतित या निकृष्ट की तरह व्यव्हार भी करेंगे. मानो उसका सबकुछ छीन लिया गया हो. शायद कुछ ऐसी ही स्तिथि महिला की भी होती है जब उसके साथ बलात्कार होता है.
जरूरत है इस बात को समझने की कि इज्जत या अस्मिता कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई छीन ले. वह व्यक्ति जिसके साथ दुर्घटना हुई है वह दया का नहीं मदद का पात्र है. उसे आपकी सहानुभूति नहीं चाहिए, उसे चाहिए आपका बराबरी वाला भाव. आप उसे लुटा हुआ न समझें, यह न समझें कि उसका ऐसा कुछ छीन लिया गया है जिसके बिना उसका जीवन व्यर्थ है. किसी की आँख चली जाये, कोई पिट कर आ जाये, कोई ठगा जाये, कोई लडाई में हार जाये तो हमारी प्रतिक्रिया वैसी नहीं होती. परन्तु जहाँ अत्याचार ने शारीरिक सम्बन्ध का रूप लिया कि हम अपनी सहानुभूति को एक और ही रूप धर देते हैं.
आप अस्मिता को अस्तित्व से अलग कर दीजिये. अस्मिता को रिस्टोर करने लायक चीज मानिये और ऐसा रिवाज भी बनाइये. फिर आप काठ की हांडी वाली मानसकिता से भी निकल पाएंगे. और आप देखेंगे कि आप जिस प्रश्न को उतना महत्व दे रहे हैं वह रह ही ना जाये.
नोट: (पहला चरण http://paricharcha.wordpress.com/2009/04/12/gender-equality-2/ पर उपलब्ध है)
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 13, 2009 at 1:57 pm, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 2 years ago
पवित्रता का ढोंग हटाए बिना स्त्री मुक्त नहीं हो सकती।
about 2 years ago
बलात्कार के बाद क्या ?? की जगह प्रश्न होना चाहिये बलात्कार क्या ?? जब तक नारी शील का टोकरा अपने सर पर रख कर घूमती रहेगी , संरक्षण खोजती रहेगी ऐसा ही होता रहेगा । बलात्कार औरत के मन का , अस्तित्व का , बोलो का , भावानाओ का या फिर उसके शरीर कही न कही होता ही है रोज हर पल फिर शरीर को इतनी importance क्यों ?? पांच तत्व हैं एक दिन पांच तत्व मे विलीन हो जायेगे । सबसे पहले नारी को अपने शरीर को ख़ुद भूलना होगा , भूलना होगा की वह सुंदर हैं , हसीन है और उसके शरीर उसकी उपलब्धि है जिसके सहारे वह पुरूष को पा सकती है । पुरूष को पाने की कामना मे अपने अस्तित्व को खोना भी बलात्कार है जिसे बहुत सी नारियाँ रोज अपने ऊपर करती हैं । जिस दिन इस शरीर के मोह से नारी अपने को निकाल लेगी बलात्कार केवल एक जबरन सम्भोग बन जाएगा जिसका मेडिकल treatment जरुरी होगा trauma treatment नहीं .
about 2 years ago
bilkul sahi baat kahi gayi hai
about 2 years ago
मित्र, एक बड़ी ही कड़ुवी सच्चाई यह भी है कि महिलाओं पर होने वाले अधिक्तर अत्याचार और अपराधों मंे महिलाएं भी सहभागी होती हैं । चाहे वह दहेज हत्या हो या फिर चकलाघर चलाने वाली मौसियां हो या दूसरे की बेटियों को बहला फुसला कर भगा कर बेचने वाली औरते हों । अगर कोई पुरूष महिलाओं की इज्जत नहीं करता है तो उसके लिए उसके घर का माहौल जिम्मेदार होता है । घर का प्रशासन चलाने वाली औरत भी होती है ।
बातें और तथ्य बहुत से है कौतुक भाई लेकिन इस बहस कर उठा कर आपने ठहरे हुए तालाब के पानी मंे पत्थर फैंका है । कुछ तो लहरें उठी हैं ।
about 2 years ago
पूरे लेख को आपने एक पंक्ति में समाहित कर लिया.
about 2 years ago
हाँ. नारी को पहले अपना अस्तित्व पुरुष के बिना ढूंढ़ना होगा. फिर वह पुरुष के साथ हो या उसके बगैर इस से शायद ही किसी को फर्क पड़ेगा. “लोग क्या कहेंगे” वाला attitude नहीं चलने वाला.
और अगर आप इस से बाहर नहीं निकल सकते तो प्लीज किसी और से, और क्या पुरुषों से, उम्मीद मत रखिये.