एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
हम वोट क्यों दें?
एक बार नजर दौड़ाईए देश के उन व्यक्तियों पर जो संभावित रूप से प्रधानमंत्री बन सकते हैं और फिर बताईये कि आपको यह नहीं लगता कि आप से कहा जा रहा है कि “इन बेशर्मों और बेगैरतों में से एक को अपना प्रधानमंत्री चुन लो”.
आप कहेंगे कि इन पार्टियों को वोट ना देकर किसी निर्दलीय या किसी तीसरी चौथी पार्टी के उमीदवार को वोट दीजिये.
तो? हल मिल गया?
वैसा उम्मीदवार अमूमन तो मिलेगा नहीं और मिल गया तो जीतेगा नहीं. चलिए मान लिया कि उसकी किस्मत जीतने की है और वह जीत गया. फिर वह क्या करेगा? किसी एक बेगैरत इंसान के साथ चिपक जायेगा. फिर पांच साल हम भकुआ की तरह उनका मुंह देखें और अपना सर धुनें. यही हमारी नियति है?
नहीं यह हमारी नियति नहीं है. यह हमारे सामुदायिक दायित्व से मुंह फेरने का नतीजा है. ऐसा इसलिए हो रहा है कि हम राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहते. हम उसके दर्शक हैं जो दूर खड़े तमाशा देखते हैं. फिर सिर धुनते हैं कि तमाशा ठीक नहीं हो रहा. फिर खुद करो ना तमाशा, किस ने रोका है? उठो स्वयं और खड़े हो जाओ मंच पर. डरते क्यों हो? तुम जैसे हजारों जब तक नहीं आते, और उनमे से उन्नत निकल कर वृहद् अकार नहीं लेते, तमाशा तो ऐसा ही होता रहेगा. अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं. एक कि स्वयं तमाशाई बन कर खड़े हो जाओ या फिर अच्छे तमाशबीन बन कर वोट करो. फिर तुम्हारे हाथ में होगा कि तुम किस का तमाशा देखना चाहते हो. कौन सबसे बेहतर है.
सबसे बेहतर का अर्थ यह नहीं कि पूरे देश में कौन सबसे बेहतर है. तुम्हे उन्ही में से चुनना होगा जो अपना सब कुछ छोड़ (यदि छोडा हो तो) कर तमाशा दिखाने आये हैं. अब उन में से कुछ लालच में आये हों और कुछ सुच्चा कलाकार हों, यह वाजिब है. और तुम्हे इस तमाशे में हर बार शामिल होना होगा. चयन इमानदारी से करते रहो. घटिया कलाकार तो स्वयं खेल से बाहर हो जायेंगे.
नहीं मानते तो संगीत को लीजिये, सिनेमा को लीजिये. आप ख़राब कलाकारों को धीरे धीरे निकालते जाते हैं और बच जाते हैं आपके पास घिस कर निकले हुए चमकते सितारे. ठीक उसी तरह नेता भी एक दिन में नहीं बनता. आपकी पसंद को भी घिसना होगा, उसे भी कई परीक्षाओं में पास होना होगा. और वह परीक्षा आप लेते हैं. आपके विचार से ही वह उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होता है. और जो बार बार उतीर्ण होता आया वही सबसे आगे की कतार में खडा है. उसे भी बार बार उतीर्ण कर के वहां तक भेजा आया है जहाँ से वह आपको साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है. अब यदि वह, जो दूर खडा सबसे ऊपर दिख रहा है, आपको पसंद नहीं है, तो जो पसंद है उसे आगे बढाईये.
इसीलिए वोट दो.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 15, 2009 at 9:01 pm, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 2 years ago
चुनावी परीक्षा में प्रश्न प्रार्थी ही तय करते हैं। ऐसे में न्याय कैसे मिले? लेकिन, आपकी बात “खुद खड़े हो जाइये” से १००% सहमत हूं! हमें अब यही करना पड़ेगा।
about 2 years ago
अब यह भी तो सम्भव नही कि १००% जनता स्वयम खड़ी हो जाये.