बहुत मुश्किल है!
बहुत मुश्किल है!
अनूप जी की चर्चा लाईफ की छुपम छुपाई और टिप्पणी रुपी भ्रमर पर मैंने एक टिप्पणी की, और सरल मन से एक सवाल पूछा. [एक राज की बात बताया जाए, इतने सारे चिट्ठे आप चर्चाकार लोग पढ़ते कब हैं? माने कि चर्चा करने का मर्म?] इसमें बड़ाई और गुर सीखने के आग्रह ज्यादा था परन्तु यह बात उसी मतलब से नहीं पढी गयी.
जवाब में आदरणीया कविता वाचक्नवी ने जो कुछ कहा : [जितने चिट्ठों पर टिप्पणी करती हूँ और जितने चर्चा में रखती हूँ, कम से कम उनसे ३० गुना अधिक को प्रतिदिन पढ़ती हूँ। बाकी चर्चाकार भी यों ही तो लिखते नहीं होंगे, यह विश्वास रखिए।] वह मुझे बुरा लगा.
मैंने अपने टिप्पणी में एक सरल मन से सवाल पूछा कि आखिर कैसे कर लेते हैं इतना काम. मेरे इस टिप्पणी में आपको बड़ाई न दिखाई दी, एक शंका दिखाई दे गयी. और आपने सफाई दे डाली. लगे साबित करने कि हम इमानदार चर्चा करते हैं. मैंने कब शक किया? ऐसा मेरी किस बात से लगा आपको?
आप बड़े हैं, अनुकरणीय हैं, सिद्धहस्त हैं. आप की बडाई करुँ तो चापलूस, टिप्पणी करुँ या किसी पोस्ट में आप का नाम लूं तो ध्यान खींचने की कोशिश, सवाल करुँ तो शंका? ऐसे भाव तो न लाईये मन में.या फिर ऐसा तो नहीं कि इस से पहले अनूप जी को बुरा लगे आप लट्ठ ले कर दौर पड़ीं? जरूरत है इसकी?
समझ में नहीं आता आपका विरोध करुँ भी तो कैसे? मैं आप लोगों को पढता हूँ कि कुछ सीख सकूं, हाँ कभी कभार एक टोकन लगा देता हूँ कि हाँ मैं हाजिर था. मालूम है शायद इसकी जरूरत नहीं है. आपको पढने वाले हजारों में हैं जो दिग्गज हैं. हमारे वजूद के होने न होने से आपकी वजन में कोई फर्क न पड़ेगा.
खैर! गलती हो गयी. क्षमा चाहता हूँ. अगली बार टिप्पणी से पहले यह दरयाफ्त कर लूँगा कि किसी को खटके नहीं.
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This post has 6 comments
April 16th, 2009
शब्दों की शक्ल नहीं होती
वरना शायद वह देख लेतीं
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April 16th, 2009
“सब्र करना सख्त मुश्किल है, तड़पना सहल है
अपने बस का काम कर लेता हूँ आसाँ देखकर ।”
अगर आप का इंगित न समझा गया तो इसमें कुछ नया क्या है ? इसलिये ही तो यह चिट्ठाजगत केवल ऐसी टिप्पणियों से भरा पड़ा है जिनमें केवल दो शब्दों (प्रशंसा के)के अलावा कुछ नहीं होता । आप पूछिये न थोड़ा विनीत होकर, प्रशंसा भाव से फिर देखिये स्वयं को कितने उत्तरों से घिरा पायेंगे आप !
और हाँ, फिर आपकी उत्सुकता की कद्र भी होगी ।
April 16th, 2009
शायद मेरा प्रश्न उतना विनम्र न था जितने की अपेक्षा रही हो. फिर भी यह निश्चित है कि मेरे प्रश्न में किसी के प्रति कोई शंका बिलकुल ही नहीं थी. फिर यह बचाव की मुद्रा?
विस्मित हूँ.
April 16th, 2009
हूँ ,बिलकुल नए लगते हो भाई !
April 16th, 2009
आप ने प्रश्न किया, आपको उत्तर मिला, आपने क्षमा मांगी, बात खतम हो गई।अब सब कुछ भूल जाइए और कोई अच्छी सी पोस्ट लिखने मे जुट जाएं।
April 16th, 2009
दिमाग कम्प्यूटर हो जाता होगा और स्केन करता होगा।