एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
आपको आपकी रचना कैसी लगी?
हम अक्सर जब भी कुछ लिख कर उठते हैं तो सोचते हैं कि आज हमने बहुत ही धाँसू रचना की है. क्या कहें इतना बड़ा तीर मारा है कि आज तो साहित्य के स्तम्भ उखड़े ही उखड़े. लोग तो बस, क्या कहने हैं. पढ़ते ही झूम उठेंगे. सामने होता तो कहीं हाथ ही न चूमने लगें. पर यह भ्रम टूटने लगता है जब कोई वाहवाही नहीं आती. और कभी वाहवाहियों का सिलसिला रुकता ही नहीं. है ना? और हम फूलते चले जाते हैं मेले में घुमते गुब्बारे के बने जानवरों की तरह.
तो जैसा कि बुजुर्ग ब्लॉगरगण कितनी बार दुहरा चुके हैं कि टिप्पणियों का आपकी रचना के गुणवत्ता से एकदम सीधा संपर्क नहीं होता. ऐसे में आप कैसे निर्णय लेंगे कि आपकी अमुक रचना अतिउत्तम, उत्तम, सामान्य या निकृष्ट है. मैं तो उस रचना को अच्छा कहूँगा जिसे पढने में कम से कम मुझे कभी अपनी समझ में कमतर न लगे. लोग वाह वाह करते हैं तो इसका तात्पर्य होगा कि मैं ज्यादा लोगों के समझ के बराबर सोचता हूँ, नहीं तो कम लोगों के. अब यह अलग बात है कि जिन कम लोगों के साथ मेरा मानसिक तारतम्य बैठता है वे स्तर से ऊपर हैं या नीचे. और इसके लिए कोई फुट-मीटर वाला डंडा तो है नहीं कि लोग निर्णय ले लेंगे कि अमुक ज्यादा समझ वाला है और अमुक कम.
तो मैंने एक प्रयोग किया अपनी ही रचनाओं के ऊपर. उन रचनाओं को जो कुछ समय पहले लिखी थी. जिस पर से मेरी और अन्य पाठकों की दृष्टि नहीं रही, फिर से पढ़ा. कई बार लगा “मजा नहीं आया”, कई बार लगा यह इससे ज्यादा अच्छा हो सकता था. और अच्छे शब्द का प्रयोग या पंक्तियों की संरचना की जा सकती थी. अन्तर्निहित भाव को और भी प्रबल बनाया जा सकता था. पर एक बात पर दुःख हुआ कि अभी तक कभी यह नहीं लगा कि हाँ “यह हुई ना बात”.
ये बातें मैं साहित्य के ज्ञान होने की वजह से नहीं कर रहा, वह तो मुझे बिलकुल नहीं है. यह मेरे प्रयोग का फल है. आप इस प्रक्रिया को साहित्य में क्या कहेंगे यह मुझे नहीं पता. पर मैं जानना चाहता था कि यदि आप ने कभी अपनी पुरानी रचनाओं का पुनरावलोकन किया हो तो क्या आपको अपनी ही रचना अच्छी लगी? यदि हाँ तो कितनी बार? क्या उसे प्रतिशत में बताया जा सकता है? कैसा महसूस हुआ आपको?
बताइए ना, आप भी अपने अनुभव.
मैं एक प्रयास कर रहा हूँ उन रचनाओं और उनमे सुधर की एक सूची बनाने की, जो मुझे आज उतने अच्छे नहीं लगते जितना कि लिखते वक़्त लगे थे. भाव आज भी अच्छे हैं पर रचना स्वयं में कमतर लगती है. जैसे कि कुछ छूट गया हो. उसे कभी बाद में प्रस्तुत करूंगा.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 17, 2009 at 6:59 pm, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
अपने पिछले लिखे का मैं भी कई बार समीक्षा की है ..कुछ बहुत अच्छी लगती है रचनाये पर कई में लगता है कि और बेहतर लिखा जा सकता था …सो कई पर दुबारा लिखा भी है .मैं भी इस बात से सहमत हूँ .कि अपने लिखे की समीक्षा करते रहना चाहिए वक़्त के साथ साथ उस में भी लगता है और बदलने की जरूरत महसूस होती है …
about 2 years ago
सही है मुझे तो कभी कभी अपनी कुछ रचनाएँ जो लिखते समय बहुत अच्छी लगी रही थी दोबारा पढ़ने पर रद्दी की टोकरी में डालने का मन करता है। कभी कभी कुछ सुधार भी करती हूँ तो कभी अपने ही लिखे पर फ़िदा हो जाती हूँ। यकीन नहीं होता की मैंने ही लिखा है।
about 2 years ago
धुआन्धार लिख रहे हो भाई -अच्छी बात है पर डर है कहीं गुणवता सफ़र न कर जाए !
about 2 years ago
कंप्यूटर के कारण अच्छा लिख पाना अधिक आसान हो गया है … कहीं भी कभी भी परिवर्तन किया जा सकता है।
about 2 years ago
कुछ अच्छी लगती हैं तो कुछ एवरेज …..पर ऐसा कभी नहीं लगा कि यार ये नहीं लिखना चाहिए था
about 2 years ago
ऐसा कोई भी पैमाना न ईजाद हुआ है, न होगा, जिससे साहित्य की गुणवत्ता को मापा जा सके। टिप्पणी अलग चीज़ है, गुणवत्ता अलग। दोनों एक-दूसरे से बिरले ही मिलती हैं। टिप्पणियों की चिंता छोड़िये, बस कर्म करते रहिये!
about 2 years ago
@अरविंद जी
चेताने के लिए धन्यवाद. आप लोगों का साथ है तो सफर करने का प्रश्न कम है फिर भी ध्यान रखूंगा कि बहकूँ नहीं.
वैसे मेरा मानना है कि मैं अभी उस साहित्य के सबसे निचले स्तर पर हूँ जहाँ से गिरने का प्रश्न नहीं है.
@अनिल कुमार जी
मैंने टिप्पणियों की बात नहीं की. जानना चाहता था कि आप जब अपनी ही रचनाओं की समीक्षा करते हैं तो कैसा महसूस होता है.