एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
शुभ प्रभात
सुबह हो गयी है. अर्धांगी कल निकल गयी आधी जान को वापस पाने के लिए अभी तक अचेत लेटी है. पुत्र जागते हुए लेट कर ऊर्जा बचा रहा है ताकि आज कल से ज्यादा साईकिल चला पाए. बेटी अपने पौनबोली (यह अधबोली से थोड़ा ज्यादा हुआ) में यह सोच कर कि सब सो रहे हैं कुछ गा रही है. बस उसी के उठने की देर है और घर में सबको जैसे कोई खदेरने लगेगा. उसे यह नहीं पता कि मैं यहाँ एक कोने में चुप से बैठ कर लोगों के ब्लॉग पढ़ रहा हूँ.
अभी-अभी हिमांशु जी के जैनूं का परिचय मिला. वे फलों के राजा आम के लिए अपनी भतीजी की फरमाईश पर उसके लिए रानी ढूंढ रहे हैं. फिलहाल उन्होंने एक बेताब लड़के की अम्मा को शांत करने जैसे भाव से बहुमत से लीची का नाम सूझा दिया है. मुझे इमली रानी की याद आ गयी. दोनों गर्मी के समय आते हैं, और सालों भर सजों कर रखे जाते हैं. राजा वह अकेला मेरा तो है नहीं सो जब तक गाँव की रजामंदी नहीं हो बेचारे गोलू आम को यह चिकनी छड़हरी इमली ऐसे ही नहीं बांधी जा सकती. खबरदार कुबडी न कहियेगा, वे तो उसके बल हैं.
अखिलेश जी के ब्लॉग पर गांधी के असफल पिता होने का विचार पढ़ा, मैं इस बहस में नहीं पड़ता पर अमूमन देखा गया है कि बहुत ही सफल या प्रसिद्द व्यक्तियों के बच्चे उनके बराबर नहीं आ पाते इसमें उनके असफल होने का प्रश्ने मुझे बेतुका लगता है.
समीर लाल जी को किसी के द्वारा उसके ब्लॉग की अकालमृत्यु के खबर पाने और उसके बाद अपने को चचा कहलाने की व्यथा पढ़ कर अभी आ रहा हूँ. सबसे ज्यादा हंसी आयी “आदरणीय तस्तरी जी” पढ़ कर.
अनिलकांत जी की अधूरी प्रेम कहानी का पूरा सच पढ़ा, अच्छा लगा.
कल किशोर चौधरी की “सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी है पढी थी, आज एक बार फिर से पढ़ा”. गजब का लिखते हैं.
इधर एक बड़ी अजीब सी बात हो गयी है, दोनों बच्चे दो महीने की छुट्टी के दौरान हिंदी और अंग्रेजी पूरी तरह भूल चुके हैं, कुछ बोलते हैं तो बस मैथिली. गाँव पर इसके लिए मुझे अभिमान था कि मेरे बच्चे शहर में रहने की वजह से अपनी भाषा से वंचित नहीं हो रहे. अभी थोड़ा खल रहा है क्योंकि उनके स्कूल शुरू होने का समय नजदीक आ रहा है. पर मुझे उम्मीद है कि वे मेरी उम्मीद से कहीं ज्यादा आसानी से वापस अपने को दोनों भाषाओँ में सहज कर लेंगे. जबरन पढ़ाने या सिखाने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं होता सो मैं उनको उनके हालत पर छोड़ रहा हूँ. टी वी देखने की वजह से उन्हें ये दोनों भाषाएँ प्रचुर मात्र में सुनाने को मिलती है. सो मैं निश्चिंत भी हूँ.
हम्म..बिटिया उठ गयी है, और उसके पीछे निकली हैं उसकी माँ, सीधे किचेन की तरफ मुंह किये. चाय बनाने के बाद मुझसे मुखातिब होंगी, लगता है कल निकले हुए आधी जान में से आधा वापस मिल गया है. शायद यही बूढी होने की प्रक्रिया है.
लीजिये चाय आ गयी. आप सबको एक शानदार दिन की शुभकामनायें.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on May 21, 2009 at 7:45 am, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 2 years ago
आपको भी शानदार दिन की शुभकामनायें. ….बुढापा खुद तमाशा दिखा देगा..घाई मत मचाओ इतनी जल्दी..अभी तो हम तक नहीं पहुँचे वहाँ तक.
about 2 years ago
आपको भी एक शानदार दिन की शुभकामनायें.