बंगलोर से गाँव जाने का रास्ता ५४ घंटे का है (यदि भारतीय रेल के समय सारणी पर विश्वास करें तो) पर मुझे कुल ६२ घंटे लगे. इसका पूर्वानुमान होने की वजह से मैं दो किताबें ले कर चला था. पर गर्मी, ट्रेन में पैंट्री कार का न होने की वजह से खाद्य पदार्थ व चाय पानी का अभाव, और अकर्मण्य हो कर न सो पाने की बुरी आदत से ग्रसित होने के कारण दोनों को मुगलसराय से पहले ही चाट डाली.

अब मुझे मालूम था कि मैं अपने प्रिय और बदहाल राज्य पहुँच रहा हूँ जहाँ जा कर हर बार मुझे पछतावा हो जाता है कि मैं यहीं क्यों पैदा हो गया. इसका तात्पर्य यह न लगायें कि मैं उसे चाहता नहीं, मैं वहां पहुँच कर जब तक किसी सरकारी तंत्र से लेना देना न पड़े स्वस्थ और प्रसन्न रहता हूँ, अब चाहे वो राज्य सरकार की संस्था हो या केंद्र सरकार की, कोई फर्क नहीं पड़ता. सो जरूरत थी खाली दिमाग में शैतान के आने से पहले कुछ ठूंसने के सामान की व्यवस्था करने की.

मुगलसराय आ गया, यह एक ऐसा स्टेशन है जहाँ ट्रेन के अन्दर आपको चढ्ढी, बनियान, बेल्ट, चप्पल, बैग, चेन, ताला और भी न जाने क्या-क्या, किसी भी समय मिल जायेंगे. माने कि चलता फिरता बाजार. एक पुरानी कहावत है फिर से याद कर लीजिये “फैशन की दौर में गारंटी की इच्छा न करें”. जी हाँ शायद आपका चप्पल घर पहुँचने से पहले ही आपको दुसरे सप्प्लायर को ढूँढने पर लगा दे, या बेल्ट पतलून से पहले अपने आप ही उतर जाए. खैर, किस्सा यह है कि जिस चीज की मैं तलाश कर रहा था वह ट्रेन में बिकने नहीं आती, साहित्य. गोया कभी कभार आपको श्री मुंशी जी या शरतचंद्र की किताबें मिल जाएँ. पर यदि आप के अन्दर पढने का कीड़ा है तो शायद आप दीमक की तरह उनके नामी गिरामी रचनाओं को पढ़ चुके होंगे. पर वो भी नहीं आया तो मैंने सोचा कि सामने वाले चाचा, जिनका सामान मुझसे ज्यादा भारी था और टिकट पटना तक का, को अपने साथ लाये कंप्यूटर का कार्टून जिसे ले कर भागना किसी के लिए भी असंभव नहीं तो कठिन अवश्य था, को निहारते रहने को कह ट्रेन से उतरा.

वहां कुछ किताबों की दुकाने हैं, एक दुकान पर वहां गुरुदत्त की पत्रलता और महाकाल ख़रीदी. बातों ही बातों में वहां खड़े एक और पाठक ने कहा कि कि हिंदी पढने वाले दिन बा दिन कम हो रहे हैं. उत्तर में दुकान वाले ने जो कहा उसका मैं कायल हो गया. उन्होंने कहा “ख़त्म तो नहीं होंगे ना, वही बहुत है”.

मैं इस उम्मीद को सलाम करता हूँ, जब से होश संभाला है हिंदी को अस्तित्व और विस्तार की चिंता करते देखे है. पर कभी ऐसा नहीं लगा कि हमारे आस पास से यह गायब हो रहा हो. उसके अस्तित्व का स्वरूप बदला हो, पर मुझे तो पहले से ज्यादा हिंदी आज दिखती है. अख़बार, टेलीविजन, पत्रिकाएं, उपन्यास इन सबकी संख्या में बढ़त ही हुई होगी. आंकडा संकलन में कोई रूचि नहीं है पर ऐसा मेरा विश्वास है.

इंटरनेट के आने से तो और भी सुविधा हो गयी है सो इसका विस्तार निश्चित है. मैं बंगलोर में रहता हूँ और २००४ से अब तक में यह फर्क दिखा है कि लोग हिंदी बोलें न बोलें समझने की चेष्टा अवश्य करते हैं (इसके पीछे छुपे व्यावसायिक मानसकिता से कोई फर्क नहीं पड़ता).