एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
ऐ जिन्दगी, तेरा शुक्रिया!
बात मेरे अन्तर-स्नातक की पढ़ाई शुरु करने के तुरंत बाद से शुरु होती है. नया नया कॉलेज वह भी मॉर्निंग. मेरे दो दोस्त भी बन गये थे. अच्छी जमती थी हमारी. गर्मी से लेकर सर्दियों तक सुबह सुबह पसीने में नहाते, बारिश में भींगते या ठिठुरते हुए कालेज जाना अभी भी याद आता है. बस यही कोई बीस साल हुए हैं जब हमारी जवानी उफान पर थी, जो पिता के फटे हुए पायजामों से बने हुए झोलों में समोसे तलाश करने से लेकर उनके जेब से निकलते कुछ हरे पत्तों की रंगीनियों तक के मजे लिया करती थी.
पर मूछों के उग आने से पहले होने वाले अनुभवों ने समोसे में छिपे दूध वाले के बकाये का स्वाद भी चखाने लगी थी. तीन हमउम्र युवक के सपने तो एक जैसे हो सकते हैं पर उनके परिवारों में फर्क होने की वजह से उनके जोश में जमीन आसमान का अंतर हुआ करता था. जो एक को तो राजदूत की सवारी को प्रोत्साहित करती थी और दो को ट्यूशन तक के पैसे बचाने के लिए प्रेरित करती थी. हमें मालूम रहता था की पटना में सबसे टिकाऊ चप्पल कहाँ मिला करती है. वहीं मेरे दोस्त को यह पता हुआ करता था की सबसे अच्छी रसमलाई कहाँ मिलेगी.
दबी दबी महत्वाकांक्षाओं के साथ हम फिर भी जिये जा रहे थे कि एक समय आया जब अन्तर-स्नातक परीक्षा का परिणाम आया जो हम सबके सर पर कुछ ऐसा पड़ा कि सारी मस्ती हवा हो गयी. परिणाम पिताजी की आँखों में कुछ इस तरह बस गया कि हमारे लिये जगह ही ना रही. यह तो बाद में समझ आया कि वे निराशा थी न कि गुस्सा जो हम समझ रहे थे. बाद में निर्णय लिया गया कि मैं शहर में रहूँगा तो कुछ नही कर पाऊँगा तो अच्छा होगा कि गाँव जा कर रहा जाय.
अब गाँव की आबो-हवा कुछ ऐसी थी कि हम तो वहीं रम गये. दरअसल हमारा गाँव हिन्दुस्तान के कई शहरों से भी बड़ा है शायद उसी की वजह से कई लोग उसे बड़का गाँव बुलाते हैं. वैसे नाम इसमें केवल २६ मुहल्ले (जो कि स्वयम में छोटे-छोटे गाँव हैं), करीब पाँच पंचायत और दो या तीन डाक-घर और एक थाना है.
अब इतने बड़े गाँव में प्रतिभा की कमी तो हो ही नहीं सकती, खासकर जब क्रिकेट खेलने की बात हो. एक क्रिकेट टीम चला करती थी पर उसमें हमसे बड़े लोग खेला करते थे जो अपनी बेरोजगारी को भुलाने के लिये इतना अच्छा खेलते थे कि कई तो दशक से उपर का रिकॉर्ड बना चुके थे. उनकी क्रिकेट प्रतिभा की तुलना अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से हो जाती थी और वही उनका पारितोषक भी था और प्रेरणा भी. इसकी वजह से हमें गाँव की टीम में जगह मिलना मुश्किल हो रहा था. फिर हमने उपाय कर के एक ‘बी’ टीम बना ली और उसी में खेलने लगे. यह एक अलग बात है कि मुझे न तो बैट पकड़ना आता था और ना ही बॉल, फिल्डिंग में भी हम दोयम दर्जे के ही रहे. पर कमजोर होने की वजह से कभी कभी बॉल फेंकते समय हाथ घूम जाता तो बॉल स्वयम घूम जाती और लोग उसे फिरकी का नाम देते. पर हमारे अपने ही टीम के लोग उसे बेरहमी से मार मार कर बॉल को हवा में और मेरा मनोबल जमीन के नीचे पहुँचा देते. ऐसा करने वालों मे अमूमन करीबी दोस्त हुआ करते थे. वो कहते हैं ना कि जिसे यार ने मारा उसका तो खुदा ही मालिक. अब मालिक को तो रहम कहीं और खाना था तो इस समय वह हमें आवारा करार दे ध्यान देना बंद किये हुए था.
खैर! दूसरे सीजन के बीतते बीतते मेरा भी उत्साह जा चुका था. बाद में ताश और शतरंज वगैरह भी शुरु हुआ पर मैं बेचैन आत्मा कहीं ठौर न पाया. हाँ इस बीच जिस काम के लिये मुझे गाँव भेजा गया था वह ठंडे बस्ते में पड़ी थी, बी० कॉम की पढ़ाई. वैसे भी मैं कोई काम निरंतर नहीं कर पाया आज तक. सिगरेट और शराब भी मुझे भाने लगे थे पर उसमें भी पैसे की तंगी ने मनोबल नहीं बढ़ने दिया.
देखते देखते मैंने तीन सालों में बी० कॉम का दो सत्र बिता दिया, और पढ़ाई मेरी इतनी शानदार थी कि दोनो गत वर्षों से धकेल कर तीसरे सत्र में तो भेज दिये गये पर विश्वविद्यालय ने मुख्य विषयों में मुझे लटकाये रक्खा. जिसका मतलब था कि मुझे तीनों सालों के ऑनर्स के पेपर एक ही साल में निकालने थे अन्यथा पास कोर्स की डिग्री थमा कर विदा कर दिये जाते. ऐसा इसलिये हुआ कि हमें मुख्य विषयों में ३० से ऊपर परन्तु ४५ से कम प्रतिशत हासिल होते. और मजे की बात थी की अतिरिक्त विषय में नम्बर जैसे अपने आप ही आ जाते. ऐसा नहीं है कि पढ़ाई के नाम पर मेरा कोई योगदान नहीं था. मुझे हमेशा लगता कि नोट्स मुझे स्वयम बनाने चाहिये और वही मुझे ज्यादा अच्छे नम्बर दिलवायेगा. परन्तु शायद मेरा सोचना गलत था. और मैं आज भी यह मानता हूँ कि हमारे उत्तर-पुस्तिका परीक्षक इमानदारी नहीं बरतते. इसके पीछे का तर्क यह है कि जब मैंने उन्हीं विषयों की परीक्षा को अंग्रेजी में उतनी ही पढ़ाई कर के दिया तो मैं सारे विषय में पास होते हुए प्रथम श्रेणी से पास हुआ. अंततः जान छूटी.
पर दूसरे सत्र की परीक्षा होते होते तीन कैलेंडर सत्र बीत चुका था सो उसकी चिन्ता ना करते हुए मैं पटना अपने पिता के पास वापस आ गया. उनकी निराशा अब पक्की हो चुकी थी. पर मैं उन्हीं के पास वापस पटना लौट चुका था. उनसे कह दिया कि अब मैं कुछ काम करूँगा. इम्तहान जब होगी तब दे आऊँगा. उन्हें कोई खुशी तो न हुई पर करते भी क्या. इस बीच तीन में से एक मित्र की शादी हो गयी थी, शायद एक बच्चा भी था. वह कम्प्यूटर की पढ़ाई कर के उसी विधा में शिक्षक बन चुका था. कुछ और भी काम करता था जो मेरी समझ में उस समय नहीं आया. दूसरा एक कम्पनी में कम्प्युटर ऑपरेटर का काम कर रहा था.
मैंने अपने शिक्षक मित्र से कहा कि मुझे हो सके तो कोई काम दिलवा दे. यह एक गलती थी.
खैर यह गलती मैंने भी की और एक कम्प्युटर पढ़ाने वाली संस्था में मार्केटिंग का काम ले लिया. एवज में मुझे एक साल का कोर्स और कुछ पैसे मिलने थे, उसी संस्था में कुछ समय बाद मैं भी शिक्षक बन गया. उन्हीं दिनों की बात है मैंने एक दोस्त से कहा था “देखना एक दिन मैं लंदन में जाऊँगा”. पता नहीं मुझे इस नाम से ही कुछ आकर्षण सा महसूस होता था. लेकिन मुझे लग गया था कि यह वो जगह नहीं है जो मुझे अपने पैरों पर खड़ा कर सके सो उसको राम राम किया और दूसरी नौकरी की तलाश में चल पड़ा. इसी तरह नौकरी बदलते बदलते अभी वाली कम्पनी में काम मिला और फिर धीरे-धीरे समय बदल गया. इस पहली नौकरी से इस नौकरी के बीच में जो हुआ वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है. अगर उसे लिखने लगा तो एक बायोडाटा चिपकाने जैसी बात हो जायेगी. अब तक मैं तीन बार लंदन जा चुका हूँ. मुफ्त की नौकरी से शुरुआत करके आज ठीक ठाक जीवन गुजारने लायक हो चुका हूँ. एक भरा पूरा परिवार है.
–शेष कहानियाँ फिर कभी.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 2, 2010 at 11:44 am, and is filed under मेरी बात. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 1 year ago
आपके इस संस्मरण में एक अजीब सा अपनापन है, कुछ अपनी बात है. एक बेचैनी है, व्यवस्था का दर्द है, विकास का हौसला है.
धन्यवाद कौतुक जी.
about 1 year ago
“इस पहली नौकरी से इस नौकरी के बीच में जो हुआ वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है.”
लेकिन महत्त्व तो इसका बहुत है, शायद ज्यादा ही, क्योंकि लंदन जाने की तमन्ना तो बीच की घटनाओं से ही पूरी हो सकी होगी । – योगेन्द्र जोशी
about 1 year ago
जान कर सच में ख़ुशी हुई कि आप हिंदी भाषा के उद्धार के लिए तत्पर हैं | आप को मेरी ढेरों शुभकामनाएं | मैं ख़ुद भी थोड़ी बहुत कविताएँ लिख लेता हूँ | हाल ही में अपनी किताब भी प्रकाशित की | आप मेरी कविताएँ यहाँ पर पढ़ सकते हैं- http://souravroy.com/poems/
about 1 year ago
aap ne b.com kiya phir itni achhi hindi
khan se shikhi