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एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

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पर्दा

Apr 7th

Posted by दरभंगिया in हँसिये

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पर्दा प्रथा का पालन करने वाले घर में
एक शहर की अल्हड़ कन्या का विवाह हो गया.
ससुर जी को आना था आँगन किसी काम से
कई बार उनके खांसने से जब वो न हिली
सास ने प्यार से हुकुम सुनाया
“बहू भीतर जाओ, ससुर जी आये हैं”
पर्दा का निरा ज्ञान लिए बहू ने भोलेपन से पूछा
“वो आये तो भीतर आप जायेंगी या मैं”?

कवितायेँ

तब के नेता : आज के नेता

Apr 7th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

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घर में भूजी भांग न रहे, फिर कहलाते थे नेता वे.
सहेज रहे जो करोडों का धन, कहलाते हैं नेता ये.

अपना दिन अँधेरा कर, थे करते रात उजाला औरों के.
अब तो उल्टी रीत है भैया, सुख छीना सारी जनता के.

वो कमाए दिन और रात, कुछ खाने कुछ गंवाने को.
इनके भेजे में दुर्बुध्धि, मन अकुलाता धन खाने को.

इंसानों का खाते-खाते, खाया चारा पशुओं का.
हद हो गयी, जब उड़ा लिया धन सेना के कफनों का.

कभी दोस्ती करें कमल से, कभी साथ उन हंसुओं का.
कभी पकड़ते हाथ किसी का, कभी बढ़ायें हाथी ये.

इनकी बातें दुर्योधन सी, कर्म करें दुश्शासन का.
फिर कहाँ से लाये ये जिगर सूर्यपुत्र या अर्जुन का.

देखो इनके मोह ने अब हरा दिया धृतराष्ट्र को.
लालच इनका ले डूबेगा अवश्य भारत राष्ट्र को.

कवितायेँ

वरुण गांधी प्रकरण: राजनीति में एक गलत शुरुआत

Apr 7th

Posted by दरभंगिया in मेरी बात

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वरुण भाई ने हिन्दुओं को यह महसूस कराने के लिए कि मुसलमान हमारे दुश्मन हैं और हमें उनसे दूरी बनाये रखनी चाहिए. उन्हें अपनी हिन्दुओं की एकीकृत शक्ति से डरा कर ही सिर्फ शांत किया जा सकता है. कुल मिला के सार तत्त्व यह कि वे हिन्दुओं को बता रहे थे कि यदि उनकी पार्टी सरकार में आये तो वे हिन्दुओं को सबसे सुरक्षित रखेंगे, खास कर मुसलमाओं से.

अब आप यदि यह कहें कि आप हमें वोट दो हम आपको किसी दूसरी कॉम से कोई खतरा न होने देंगे तो किसी को ऐतराज न हो. पर उनके भाषण में आपत्तिजनक शब्द थे. मैंने तो पूरा न देखा न पढ़ा. पर जो कहीं टुकड़ों में मिला वह उन्हें एकदम से निर्दोष तो साबित नहीं करता.

अब लेते हैं बहन जी की बात. उन्होंने वरुण को रोकने के लिए सिर्फ गिरफ्तार करना जरूरी न समझा. जो कि आसानी से किया जा सकता है. हरेक मजिस्ट्रेट को यह अधिकार होता है कि किसी भी व्यक्ति को शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए गिरफ्तार करे या अपने जिले में आने से मना कर दे. आप उदहारण लेना चाहें तो, लालू जी ने आडवाणी जी का रथ रोका था, पर ऐसा किसी कानून का इस्तेमाल नहीं किया था जो उन्हें राष्ट्रघाती साबित करने पर तुली हो. यदि हिन्दू-मुस्लिम में तनाव पैदा करना राष्ट्रघाती है तो अगड़े-पिछड़े, या जातिगत तनाव पैदा करना भी उतना ही बड़ा दोष है. पर उन्होंने वरुण को सबक सिखाने के लिए रासुका का प्रयोग किया है.

अब हालात यह है, कि कल को कोई भी सरकार इस कानून का, इस प्रकरण से सीख लेते हुए, इसे विरोधी दल के नेताओं पर प्रयोग कर सकती है. फिर इस कानून का महत्व राष्ट्रीय-सुरक्षा से न जुड़कर गंदी राजनीति से हो जायेगा.

कानून का ऐसा दुरुपयोग रोकना चाहिए. रासुका देश को सुरक्षित बनाने के लिए बनाया गया कानून है. इसका गलत उपयोग इसे संसद को इसे निरस्त करने पर बाध्य करेगा और फिर वह न हो सकेगा जिसकी जरूरत है.

भगवन इन नेताओं को सदबुध्धि दे.

Hindi, Vichar

आजादी

Apr 7th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

5 comments

आज कल कोई भाव ही नहीं उठता मेरे मन में
हाँ कभी कभी एक धुआं से निकलता है कुछ
जो पसर जाती है मेरे ऊपर के आकाश में
और नहीं देखने देती मुझे चाँद या सूरज.

देख सकता हूँ कुछ तो बस पैरों के नीचे दबी जमीन,
जोड़ से दबा रखा है और घुसा रखे हैं पैरों के नाखून.
कि कहीं खो न जाये बचा हुआ एक टुकरा जमीन
जिसे पुरखों ने बड़े ही जतन से संजोया था.

आखिरी बार जाने से पहले कह गए थे दादी से
और तुम देखोगी उन्हें राज करते अपने देश में.
पर अफसोस उन्हें हमारा विकास गंवारा न था
तभी तो चल बसी वो हमें नेता बनते देख कर.

कभी खुली सड़क पर कत्ल होते नहीं देखा
ना ही देखा किसी कि अस्मत मोहल्ले में लुटते हुए
राशन की कतारों पर गोलियां चलती भी नहीं देखी
उन्हें क्या पता कि आजादी क्या है.

उन्हें क्या मालूम उत्तर – दक्षिण का फर्क
नहीं पता उन्हें तो धर्म, जाति व भाषा के भेद.
ना ही मालूम उन्हें कि भाषण का नया तरीका
जो देती है छूट हमको अपने मन का बोलने का.

खुद तो पढ़े थे बस कुल जमां आठ
फिर तो लग गए थे वे उन बुरे लोगों के साथ.
जिन्होंने पकरा दिया बन्दूक उनके हाथ
और भर दिया जहर उनके पैर से माथ.

नहीं तो आज वे जरूर कहीं के सांसद होते
और हमारे ढेरों पेट्रोल पम्प और ठेके होते.
होती हमारी एक क्षेत्रीय पार्टी भी यहीं
और आते हर चुनाव में माल हमारे हाथ.

मर गए खुद इसी आजादी का काम ले कर
जीते रहे सुबहो शाम जिसका नाम ले कर.
और हम जो करें मजे इस आजादी के
तो चिढाते लोग हमें उन्ही का नाम ले कर.

कवितायेँ, Hindi

मैं उर्मीला मतोंडकर से शादी करना चाहता था

Apr 6th

Posted by दरभंगिया in हँसिये

1 comment

जवानी के दिनों में लगभग हर लड़का किसी न किसी अदाकारा का दीवाना हो जाता है. मैं उर्मीला का था. पर दिल को पूरा यकीन था की उर्मीला तो हमारे लिए चाँद है. और यदि चाँद मिल भी जाये तो उसे रखोगे कहाँ? मान लो वह कह भी दे कि मैं तुम्हारे दिल में रह लूंगी. पर दिल में खाना-पीना, सोना, गाना, नाचना और नहाना-धोना, कपडे सुखाना, सामान रखना, गाड़ी पार्क करना वगैरह? ना बाबा ना, रखूंगा तो घर ही.

फिर हमने ख्याल किया कि पूरी की पूरी उर्मीला न रख कर उसकी छवि दिल में बसा लेंगे. पर हुआ यूँ कि हम आ गए नौकरी में और हमारी प्यारी उर्मीला दिल में अन्दर ही अन्दर बहुत अन्दर दबती चली गयी. उसके ऊपर आ गया था महीने का किराया, मोटरसाईकिल की किश्तें, बनिए का बिल आगे की पढाई-लिखाई के खर्चे वगैरह.

फिर हमारी माता-राम को यह समझते देर नहीं लगी कि अब मुझे उर्मीला की जगह यदि कोई और देखभाल (परेशान) करने वाली कुछ साल और न आयी तो फिर कहीं मैं भी वाजपेयी जी से प्रेरित न हो जाऊं. सो चारों और जासूस भेजे और ढूंढ ही लिया हमारे वर्त्तमान पत्नी को. (यह भी प्यारी कहानी है, लिखूंगा जीवनी में :) )

अब आप पूछोगे कि अचानक से उर्मीला की याद क्यों आ गयी? तो हुआ यह कि मैं अभी अभी एक नुक्कर पर चाय पीने गया और वो दिख गयी. फिर मुझे याद आया कि उर्मीला अभी तक कुंवारी है. और मन में पश्चाताप की भावना आ रही है कि कहीं वह तपस्या तो नहीं कर रही. वैसे भी उसकी योग मुद्राएँ बहुत गंभीर होती हैं. रंगीला की उसकी मुद्राएँ तो बाबा रामदेव को कभी भी पछाड़ दे.

अब उर्मीला दिल में इतनी अन्दर घुसी हैं कि ढूंढें नहीं मिलती, और मिलेगी भी कैसे उसके ऊपर बाकी जिम्मेदारियों और दो बच्चों के साथ आजकल एक महिला बैठी दिखती है, जिसे लोग बहुत ही आदर से मेरी पत्नी कहते हैं.

बेचारी उर्मीला तक यदि कोई यह सन्देश पहुंचा दे कि मैं अब उसके काम का न रहा. ताकि वह भी किसी का, भूतों के कॉमेडी फिल्में बनाने वाले का ही सही, हाथ पकड़ ले.

मशखरी, Hindi, lekh
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