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इस रात की सुबह तो जल्दी आयेगी

Jan 16th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

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तुम तो रहोगी दूर, मगर रात तो आयेगी
यहाँ न होगा आँचल तेरा, क्या हवा सुलायेगी
सुबह तो होगी रोज पर वो कैसे मुझे जगायेगी
कपरों की सिलवटों से तुम्हारी याद तो आयेगी

एक नयी आदत लगी है तुम से झगरने की
जब दिल न लगेगा तो ये घर मुझे चिढायेगी
सूना दरवाजा सूना कमरा खाली बिस्तर
ये सब हर पल हर दिन मुझे रुलायेगी

बिखरी चीजों की याद तुम्हे भी आयेगी
बच्चों की शैतानी से जब तुम थक जाओगी
“कहाँ गए तुम” यह आवाज अन्दर से आयेगी
हम तो रहेंगे दूर मगर याद तो आयेगी

हाँ फोन करूंगा और तुम भी करना
क्या इन से जुदाई कुछ कम हो पायेगी
है भरोसा ये रात नही है ज्यादा लम्बी
इस रात की सुबह तो जल्दी आयेगी

कवितायेँ, Hindi, Kavita, Poem

सत्यम

Jan 16th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

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लेखा को समझ “ले” और “खा”
मिल के दोनों बाप और पूत
कर गए सात अरब का लूट
नाम है सत्यम बेचते झूठ

सब कानून को चकमा दे कर
५३ हजार को सदमा दे कर
बाजार कर दिया चकना चूर
नाम है सत्यम बेचते झूठ

देश और आंध्र के गर्व थे जो
लाखों की उम्मीद रहे जो
आज हो गए हैं देश कपूत
नाम है सत्यम बेचते झूठ

कवितायेँ, Hindi, Kavita, Poem, Satyam

सुख का भरम

Jan 7th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

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हाँ कुछ अच्छा भी हुआ था आज

मैंने बिटिया को स्कूल छोरा

और बेटे के साथ की थोरी मस्ती

दफ्तर को निकलने से पहले बीवी को क्या प्यार

बहुत अच्छा लगा ये सब बहुत दिनों के बाद

 

अरे नही, हम एक कॉम से आते हैं

जो पुरा दिन काम में लगा देते हैं

और जमा करते हैं कुछ चर्बी अपने तन में

जो दिखाती है कि कितने कर्मठ होंगे हम

 

कसूर हमारा नहीं कि हम ऐसे हो गए

थे तो हम भी निठल्ले ही बचपन से

कि अचानक शौक चर्राया नौकरी का

और अमीरों की तरह जीने का

 

कुछ इस तरह अमीर होने लगे हम

कि चल नहीं सकता घर दो महीने

बिना माहवारी तनख्वाह और भत्ते के

हाँ मिला एक भरम कि हम सुखी हैं

 

शायद हम भी आज एक किसान होते

पर पुरखों को रास आया नहीं खेत

और हमें नहीं भायी गाँव की धूल

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पुकार

Jan 7th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

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आज कल कुछ खास होता ही नहीं
और अगर होता भी है तो कुछ मौतें
और होती है कुछ गिनतियाँ और समीक्षाएं
मालूम नहीं कब तक यूँ मैं रोज मरता रहूँगा
किसी आतंकी, किसी अपराधी, किसी नेता के हाथों
कोई बचाए ऐसा तो कोई दीखता ही नहीं
एक ही बार में मार डाले ऐसा कोई दिखे तो कहना

कवितायेँ, Hindi, Kavita, Poem

हम तुम

Jan 5th

Posted by दरभंगिया in कवितायेँ

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सुबह तो कल भी हुई थी और आज भी

पर बदले हुए ते हमारे आज मिजाज भी

कल करवाहट चाय की हुआ करती थी

पर आज करवे थे हमारे जवाब ही

 

यह पहली बार ही हुआ है आज कल में

बस हमी को लग रहा है एक जमाना हुआ

एक पल तो गुजरता नही है दूर हम से

और हम झगरते हैं जैसे मजबूर नही

 

मेरी तो पुरानी आदत है आवारगी की

तुम यूँ ही शराफत सिखाये जाती हो

जैसे बदल पकड़ के छुपा लोगी तुम

और वो चिपका रहेगा तुम्हारे सीने से

 

मालूम है मुझे घबराना तुम्हारी आदत है

तुम ही भूल जाती है मैं कोई आम नही

हमने शर्तों पर चलने कि कसम नही खाई थी

फिर अब क्यों पकड़ रक्खा है जैसे बुलबुला

कवितायेँ, Hindi, Kavita, Poem
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