एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
मेरा क्या है, मैं तो बस पिता हूँ
आजकल रात बहुत छोटी होती है
थोड़ी थोड़ी देर में बिटिया रोने लगती है
कभी कभी कुढन भी होने लगती है
नहीं कुढ़ती है, तो वो बस मेरी पत्नी
कहती है उसीने तो उन्हें जना है
तभी तो कुढ़ना उसके लिए मना है
उन्होंने मान दिया है उसको कुछ ऐसे
अहसान किया हो जनम कर जैसे
मुझे क्या जब उसे भी नहीं शिकायत इन से
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कहती है, मेरा क्या है मैं तो बस पिता हूँ
दुःख भरी ये उलहन चुप से सुन लेता हूँ
क्योंकि मेरा क्या है, मैं तो बस पिता हूँ
मैं नहीं आंकता तुम्हारा दर्द सहा हुआ
पर अच्छा नहीं लगता ऐसा कहा हुआ
मैं इतने आसानी से भी नहीं पिता हुआ
नहीं, मैं बस पिता नहीं, एक पिता हूँ
जिसने अपनी सालों की नींद गवां दी
और इन बच्चों की दुनिया सजा दी
नहीं मानती, तो बस एक शर्त कर लो
अगली बार हमारा पति-पत्नी का रोल उलट जाये
प्रभु के द्वार बस इतनी ही अर्ज कर लो
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अरे छोरो! अब तुम क्या पति बनोगी
छोरियां होंगी हजार बटा आठ-नौ सौ
तो फिर तुम्हे मैं यूँ ही ना मिलूंगा
इतनी किल्लत होगी लड़कियों की
रूप का तो कोई जिक्र भी न करेगा
जिसको जो मिलेगी वह उसी पर मरेगा
ऐसे में मैं क्यों तुम से शादी करूंगा
किसी बड़े अमीर के पल्ले न हो लूँगा
बच्चे किसी पालने वाली कंपनी को दे दूंगा
अगरचे तुम भी अमीरजादा हो गयी
तो फिर हमारे इस रोल बदलने और
बच्चे पालने की नौबत क्यों आ निकली
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मुझे फिक्र इसकी भी है कि कहीं तुम
अगले जनम और गरीब ना हो जाओ,
उस पर दो बच्चों की पिता न हो जाओ
मुझे पता है पिता होना इतना सरल नहीं
जितना समझ तुम मुझे कह देती हो
कि मेरा क्या है मैं तो बस पिता हूँ
यही सोच कर तुम्हारे भले के लिए
भूल जाता हूँ तुम्हारे ताने कल के लिए
फिलहाल तैयार होना है दफ्तर के लिए
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| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on March 3, 2009 at 6:59 am, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

