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एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग

कितना उसने मुझे सताया

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रात बहुत अंधियारी थी और
इन्द्रदेव का मूड अलग था
नही जानता मैं अज्ञानी कि
प्रसन्नता या कुछ कारण और.

झम झम करके रही नाचती
सुकुमारी बरखा सारी रात.
बिजली रानी के वियोग में
नही सूझते हाथों को हाथ.

बात राज की बतलाऊंगा अब
हँसना ना तुम हे प्रिय सिरमौर.
कल रात स्वामिनी मेरे घर की
करती रही एक उजड्ड संग घुरदौड़.

क्या बतलाऊँ कैसे बतलाऊँ
है कितना उसने मुझे सताया.
आकर मध्य युगल के उसने
कितना उसने हमें जलाया.

हया-दया ना धर्म है उसको
था गाना उसके कान में गाता.
वो तो बस छूने ही वाला था
कि उठकर निकाला मैंने छाता.

हुआ दरअसल ऐसा कुछ मित्रवर
लगी मुझ को भाग्य से लघु शंका.
और हड़क कर दुबका कहीं वो राक्षस
जैसे हनुमान स्वयम् पहुँचे हो लंका.

पर “ढीठ” कहाँ है ऐसे मानते
हो गया शुरू फिर वहीं वह प्रचंड.
चूम ही डाला मेरे प्रियतम को
जैसे करता कोई मनचला उद्दंड.

और फिर मुझ बदकिस्मत को देखें
कैसे कहूँ कहाँ कहाँ उसने है काटा.
जब जब मैंने किया वार घात को
खाना पड़ा अपने मुँह पर ही चाँटा.

देर से जागी पर जागी बुद्धि मेरी
स्मृत हुआ बुजुर्गों से सुना उपाय.
वही किया हमने जो सब हैं करते
भगा दिया दुष्ट को कछुआ जलाय.

Mosquito_coil

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One Response to “कितना उसने मुझे सताया”


  1. Buck Hodor
    on Sep 6th, 2010
    @ 1:08 pm

    You will experience some rejection at the outset, but you must be persistent.

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