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हड्डियों का अभाव है

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रोज देखता हूँ कुछ कुछ रेंगते हुए लोग
और उनसे लिपट कर रेंगते हुए कुछ और लोग.
दिन रात बस उन्हीं से पाला पड़ता है मुझे
मैं भी उनसे डरकर अब रेंगना सीख रहा हूँ.

मुझे याद आता है वो दिन भी
जब जोड़ से पत्थर उठा कर फेंका था
उस कीचड़ उछाल कर जाती कार को.
पर ये तब की बात है जब मैं खड़ा था.

अब तो बस किसी तरह घर से निकलता हूँ
चलते-फिरते या किसी निर्जीव का शिकार करने.
और वापस आ जाता हूँ अपनी मांद में
शुक्र मनाते हुए कि एक दिन और जी लिया.

बचपन में पढ़े हुए जोश और जवानी के किस्से
झूठे हैं, खोखले हैं, बेकार हैं, गुमराह करते हैं
रोज देखता हूँ कि एक से एक बहादुर
रेंग रहे होते हैं मेरे साथ कतारों में.

मैं नहीं कुचला गया किसी कार के नीचे
ना ही किसी गड्ढे में गिरा
जबकि मैं रेंग रहा था सारा दिन.
अब मैंने संभल कर रेंगना सीख लिया है.

धीरे से बिना आवाज अपना ही थूक गटकते
एक और दिन जी लिया यही सोच खुश होते हुए.
काश सबके सब आ जाते किसी चीज के नीचे
पर ऐसा तो तब हो जब कोई खड़ा चलता हो.

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3 Responses to “हड्डियों का अभाव है”


  1. समीर लाल ’उड़न तश्तरी’ वाले
    on Sep 22nd, 2009
    @ 8:46 pm

    बहुत गहरी रचना!!


  2. lalit sharma
    on Sep 22nd, 2009
    @ 10:49 pm

    धीरे से बिना आवाज अपना ही थूक गटकते
    एक और दिन जी लिया यही सोच खुश होते हुए.


  3. रंजना
    on Sep 22nd, 2009
    @ 11:01 pm

    बचपन में पढ़े हुए जोश और जवानी के किस्से
    झूठे हैं, खोखले हैं, बेकार हैं, गुमराह करते हैं
    रोज देखता हूँ कि एक से एक बहादुर
    रेंग रहे होते हैं मेरे साथ कतारों में.

    त्रासदी को सटीक और सार्थक शब्द दिया है आपने……बहुत ही सुन्दर समसामयिक रचना..वाह !

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