एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
मनुहार
सुबह की अलसाई बेला में जब अंगडाई लेती तुम प्रिये
न पूछ कहाँ किधर कैसे उठती है एक टीस प्रिये.
रात नहीं गुजरी अब तक, मन चंचल फिर हो जाता है
थोड़े ही रसपान से कहीं भंवरे का मन भर आता है.
न चाँद मलिन, न सूरज नभ पर, तारे भी हैं अभी वहीं
अब दूर पडी दीवाल घड़ी भी तो सुस्ताया जाता है.
न देती सुनायी अजान अभी और न घंटी बजी शिवाला की
अब दे न देना तू मुझको इस बार दुहाई सुबह की.
माना हो तुम सुन्दर प्रिय पर देर न करो नवबाला सी
दे मुझको उन्मुक्त सुबह और नशा तुम्हारे हाला की.
कर के जिसका पान प्रिये मैं झूमूं दिन भर आँगन में
मान मेरा कहना तुम आ जाओ अभी आलिंगन में.
अब आ भी जाओ रतिरूपा, करवाओ न मनुहार प्रिये
रहा नहीं जाता अब मुझको दूर तुम्हारे अधरों से.
जो न आयी पास स्वयं तुम, मैं आ जाऊँगा अभी वहीं
बुझती नहीं है प्यास मेरी बस देख तुम्हे अब नजरों से.
नहीं आज नहीं फिर मानूंगा मैं तेरे मीठे तानों से
लिख लेने दो मुझे नाम मेरा इन उठती गिरती सांसों पर.
हार गले ले कर जिनका दिया है जीवन दान सखी
करने दो मुझे अधर-राग उन सुन्दर कोमल बाँहों पर.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on March 9, 2009 at 6:44 am, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

