एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
एक बेनाम यादगार मुलाकात
मिटती नहीं है याद से
जब कहीं दूर अपने घरौंदों से
मिले थे उन्मुक्त भाव से ठंडी सड़क पर
तीखी हवाओं के बीच से
जो चीर कर निकला करती थी छुपी हुई देह को
हम चले थे हाथों में हाथ डाल
बात उस रात की
मिटती नहीं है याद से
जो कहा था तुमने
तुम किसी से खुलती नहीं
इसलिए कि तुमसे कोई खुल कर मिला नहीं
चुप रहना समझ लेती हो बेहतर
और देती हो आजादी उनके विवेक को सोचने का
मिटती नहीं है याद से
यह सोच कि कितना अजीब होगा
तेरे अन्दर का कोलाहल
जो सुन न पाए खुद चुप रहने वाले
मैंने देखी है वह अल्हड़ और शर्माती हंसी
जो जानती है कहाँ जाती है उसकी चोट
और छोड़ जाती है दिल पर खराश
मिटती नहीं है याद से
कि हम मुस्कुराते थे साथ साथ
दुनिया से छुपकर
सिर्फ इसलिए कि कहीं शुबहा न करने लगे लोग
और उन्मुक्त हंसी को दे दें कोई नाम
एक बेनाम यादगार मुलाकात को
मिटती नहीं है याद से
कि छोड़ आया मैं तुम्हे तनहा सुरुरों में
यह सोच कि खलल न पर जाये तुम्हारे ख्वाबों में
और सो न सका कई-कई रात
खुली आँखों से सपना देखते हुए
तुम्हे काले कपडों और सफ़ेद रोशनी के बीच
बिना यह सोचे कि यह तुम्हारा भी सपना या नहीं
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on March 30, 2009 at 4:01 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
मिटती नहीं है याद से
कि छोड़ आया मैं तुम्हे तनहा सुरुरों में
यह सोच कि खलल न पर जाये तुम्हारे ख्वाबों में
और सो न सका कई-कई रात
खुली आँखों से सपना देखते हुए
तुम्हे काले कपडों और सफ़ेद रोशनी के बीच
बिना यह सोचे कि यह तुम्हारा भी सपना या नहीं
well said……bahut khoob.