एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
मिल के रहिये
इतनी भाषाएँ, इतने प्रान्त
कुछ गरीब और कुछ संभ्रांत
देखो हैं ये कितने अशांत
मेरे दिन और उसके रात
मिले जब दोनों साथ
करते थे कुछ ऐसी बात
हो नहीं सकता भला इनका
जब तक न चलें
ये ले हाथों में हाथ
नहीं मिलेगी सुकून तुम्हे
कितने अजाँ ही कर लो तुम
और रगड़ लो टीके माथ
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on March 30, 2009 at 11:59 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

