एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
दिल
दिल्ली हिंदुस्तान का दिल है
बड़ा ही मजबूत और सुन्दर
करोडों को खुद में समाये हुए
पूरे वतन का बोझ उठाये हुए
एक दिल करता है खून से विष की सफाई
पर इस दिल की है ऐसी शामत आयी
पूरे शरीर से आये हुए विष
अब तो ह्रदय में ही बसना चाहते हैं
और चाहते हैं दिलो-दिमाग पर राज
उस पर बाकी पीड़ित अंग
भर रहे हैं बस इतनी ही आहें
कि ये विष दिल में या कहीं और चले जाएँ
परिष्कृत हों न हों, पर वापस न आयें
सुना है तंत्र को मौका मिलेगा
चुनने को खून और विष में अपनी पसंद
पर क्या करे यह जड़ तंत्र
जब कोशिकाओं में ही नहीं उमंग
दिल भी क्या करे
उसकी भी एक क्षमता है
उसे खून में से विष अलग करना है
पर कैसे निकले विष से खून
विष को ही चुनता है
और निराश पड़ा देखता है
थोड़ा बहुत बचा खून भी
धीरे धीरे हो रहा है नीला
अभी अभी जाने वाला योगी
लौट कर आ जायेगा
ऐसी एक आस भी है
चाहे यह देह न हिले न डुले
आशा है जब तक आख़िरी सांस भी है
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on March 31, 2009 at 10:19 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

