मालूम है तुम्हे गोरैया नहीं देती अंडे पुराने घोंसलों में.
पर इंसान एक ही घर, एक ही जगह जिन्दगी देता है गुजार
सोच कर कि एक दिन सुनहरे हो जायेंगे इन घोंसलों के तिनके.
पर यह कुछ नया तो नहीं है.

एक हवा चली है शहर में आजकल
जो खींच कर तुम्हारे होश
फेंक देगी तुम्हे  किसी बावली भीड़ में
और तू भी चला जायेगा नारे लगाते हुए.

फिर खेलेंगे वो तुम्हारे दिल से
किसी नरपिशाच की तरह.
तुम्हे याद न रहेगा कुछ और इस जहाँ में,
कभी कभी माँ याद आ जायेगी जब पाओगे खुद को नग्न.

इंसान बहुत ही विकासशील जीव है
और तुम उसका एक नमूना.
तभी तो कोई और बताता है कि तुम्हे कैसे जीना है.
इस से अच्छा विकास और क्या होगा.

और इस विकास के लिए तो वोट डाल
तू बता कि तू किसकी मर्जी से जीना चाहता है
बता उन्हें कि वे पसंद हैं तुम्हे सिरमौर की तरह
और तुम्हे मंजूर है उनका तुम्हारे ख्वाबों का रौंदना.

या फिर कह दो कि नहीं चाहिए तुम्हे किसी का विचार.
दे दो मुझे मेरे हिस्से की जमीन और मेरा आसमान
जहाँ हम दो रोटियां उपजा कर सो जायेंगे आस्मां ओढ़ कर.
बच्चों की किलकारियों के साथ नींद बहुत अच्छी आती है.

रात कुछ ऐसे चली गयी जैसे परायी हो
सूरज ऐसे चढ़ रहा ऊपर जैसे महंगाई हो.
निकला न करो घर से अपने ऐ दोस्त
न जाने कहाँ किस मोड़ पर दिल की रुसवाई हो.