एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
निकला न करो घर से अपने ऐ दोस्त
मालूम है तुम्हे गोरैया नहीं देती अंडे पुराने घोंसलों में.
पर इंसान एक ही घर, एक ही जगह जिन्दगी देता है गुजार
सोच कर कि एक दिन सुनहरे हो जायेंगे इन घोंसलों के तिनके.
पर यह कुछ नया तो नहीं है.
एक हवा चली है शहर में आजकल
जो खींच कर तुम्हारे होश
फेंक देगी तुम्हे किसी बावली भीड़ में
और तू भी चला जायेगा नारे लगाते हुए.
फिर खेलेंगे वो तुम्हारे दिल से
किसी नरपिशाच की तरह.
तुम्हे याद न रहेगा कुछ और इस जहाँ में,
कभी कभी माँ याद आ जायेगी जब पाओगे खुद को नग्न.
इंसान बहुत ही विकासशील जीव है
और तुम उसका एक नमूना.
तभी तो कोई और बताता है कि तुम्हे कैसे जीना है.
इस से अच्छा विकास और क्या होगा.
और इस विकास के लिए तो वोट डाल
तू बता कि तू किसकी मर्जी से जीना चाहता है
बता उन्हें कि वे पसंद हैं तुम्हे सिरमौर की तरह
और तुम्हे मंजूर है उनका तुम्हारे ख्वाबों का रौंदना.
या फिर कह दो कि नहीं चाहिए तुम्हे किसी का विचार.
दे दो मुझे मेरे हिस्से की जमीन और मेरा आसमान
जहाँ हम दो रोटियां उपजा कर सो जायेंगे आस्मां ओढ़ कर.
बच्चों की किलकारियों के साथ नींद बहुत अच्छी आती है.
रात कुछ ऐसे चली गयी जैसे परायी हो
सूरज ऐसे चढ़ रहा ऊपर जैसे महंगाई हो.
निकला न करो घर से अपने ऐ दोस्त
न जाने कहाँ किस मोड़ पर दिल की रुसवाई हो.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 12, 2009 at 9:10 am, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
या फिर कह दो कि नहीं चाहिए तुम्हे किसी का विचार.
दे दो मुझे मेरे हिस्से की जमीन और मेरा आसमान
जहाँ हम दो रोटियां उपजा कर सो जायेंगे आस्मां ओढ़ कर.
बच्चों की किलकारियों के साथ नींद बहुत अच्छी आती है.
kya kehn hum,gehre bhav liye ek sunder rachana,suraj aise nikla jaise mahangai ho…waah.,aur satya ke karib,ab tarif ke liye alfaz kum hai…
about 2 years ago
कविता की पहली 2 पंक्तियों पर एक शेर
परिंदे भी नहीं रहते पुराने आशियानों में
हमने उम्र काटी है किराए के मकानों में ! .
about 2 years ago
वाह, क्या खूब कहा है.
आपने तो सजा दिया इस कविता को अपने शेर से.