आज फिर देखने में आया नेता जी का चेहरा.
बस दो ही कमी थी एक घोडी और सेहरा.
बारात भी थी, और बज रहे थे बाजे भी.
बस कमी रह गयी थी, तो एक दुल्हन की.

उफ़! ये मासूमियत. उन्हें पता ही न था,
कितना दुःख है बारातियों के घर में.
कि वे चले आये नाचने, भरी दोपहर में.
छोड़ कर एक बीमार और रोती हुए बच्ची.

सच में बहुत मासूम है उनका दिल.
देखा नहीं जाता किसी का दर्द एक भी पल.
तभी तो दे आये पांच हजार सुख्खू को
और कह आये, लगवा लेना एक चापाकल.

और क्या कहूं उनके मासूमियत की.
बिना निश्चिंत हुए वह नोमिनेशन में कैसे आता.
इसीलिए तो बुलाने से पहले मोहन को उसके घर से,
भेज दिया था डॉक्टर, बुढ़िया की इलाज के लिए.

इतने मासूम हैं कि थोड़े डर से गए हैं.
विरोधी नेता इतना खतरनाक है और पुलिस निक्कमी.
कि निकलवाना पड़ा जेल से सबसे बड़े गुंडे को
अपनी और जनता की जान बचाने के लिए.

अब ऐसी मासूमियत में उनसे क्या कहें हम.
कि किस तरह याद आते रहे हमें वे पांच साल.
उनका चेहरा देख कर ही चुप हो जाते हैं लोग,
कोई और नेता होता तो जरूर करते बवाल.

मैं भी कहूं कि श्रीमान क्यों इतना मुस्काये हैं.
अब पता चला मासूमियत से लबलबाए हैं.
मैं भी समझा लिया करता हूँ दिल को अपने
वे कैसे देखें दुःख, इतनी मासूमियत हो जिनमे.