है आज मुझे नहीं, कुछ सूझ रहा.
और ना ही यह मन, कुछ बूझ रहा.
मुझको है चुनना, मेरा नेता, पर हा!
चाल-चलन उनका, अब भी अनबूझ रहा.

कब तक यूँ अन्धकार में
देगा शब्दभेदी वोट तू.
खोले आँखें, देख बाहर
है कितना प्रकाश पड़ा.