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कल चुनाव है

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है आज मुझे नहीं, कुछ सूझ रहा.
और ना ही यह मन, कुछ बूझ रहा.
मुझको है चुनना, मेरा नेता, पर हा!
चाल-चलन उनका, अब भी अनबूझ रहा.

कब तक यूँ अन्धकार में
देगा शब्दभेदी वोट तू.
खोले आँखें, देख बाहर
है कितना प्रकाश पड़ा.

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2 Responses to “कल चुनाव है”


  1. mehek
    on Apr 16th, 2009
    @ 12:44 pm

    कब तक यूँ अन्धकार में
    देगा शब्दभेदी वोट तू.
    खोले आँखें, देख बाहर
    है कितना प्रकाश पड़ा.

    sahi baat dekh parakh ke vote karna chahiye,choti si magar ankhein kholti rachana badhai


  2. अफ़लातून
    on Apr 16th, 2009
    @ 3:00 pm

    प्रभावी कविता । बधाई ।

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