एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
इसलिए की लोग जान जाते हैं मेरा नाम
और जब किसी प्रिया का सौंदर्य वर्णन करता हूँ
सोचती है जानकार युवतियां ”कहीं ये मैं तो नहीं”.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
क्योंकि मिलने लगी हैं कुछ युवतियां मेरी पत्नी से,
सुबह, शाम, दोपहर छत के मुंडेर पर.
मुझे डर है कहीं वो लेती न हो मेरा नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि लिखे जो ख़त कभी वो युवतियां,
नहीं पहुँच पाए वे मेरी पत्नी के हाथ.
न मालूम हो किसी को तख्खलुस वाले का नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस.
कि न सुनूं जब गालियाँ दें कोई सरेआम.
देगा वो गालियाँ मेरे तख्खलुस को, देने दो.
मुझे कहाँ आदत सुनने का कोई और नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि कोई नेता जब कभी भड़क जाए.
लाख चाह कर भी मेरी भनक ना पाए,
क्योंकि उसे कहाँ पता होगा मेरा नाम.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस.
लिखने के कारण कहीं बदनाम जो हो जाऊं
तो लोग बाग़ न पुकारें मुझे मेरे नाम से.
और जा सकूं बाहर, सुकून से अपने काम से.
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
हाँ बस उन्ही बुरे दिनों के लिए.
यही कौतुक है. वर्ना क्या कम है
मेरा नाम जिन्दगी भर के लिए.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 16, 2009 at 1:15 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
बहुत दमदार कविता है, पढ़कर मन में एक कौतुक सा जाग गया… इस को पढने के बाद मैंने भी अपने लिए एक तख्खलुस की खोज शुरू कर दी है …
about 2 years ago
मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि कोई नेता जब कभी भड़क जाए.
लाख चाह कर भी मेरी भनक ना पाए,
क्योंकि उसे कहाँ पता होगा मेरा नाम.
waah bahut khub
aur hamare blog par aapki likhe aur do sher bhi pasand aaye shukran
about 2 years ago
बेहतरीन!!
अब क्या कहें-हम तो तख्खलुस भी वही धर लिए हैं:
-समीर लाल ’समीर’
about 2 years ago
बढिया लिखा है।
about 2 years ago
बहुत सुंदर। वैसे अब से पहले हमने सोचा ही नही था की तख्खलुस इतने काम की चीज है।