मुझे चाहिए एक तख्खलुस
इसलिए की लोग जान जाते हैं मेरा नाम
और जब किसी प्रिया का सौंदर्य वर्णन करता हूँ
सोचती है जानकार युवतियां  ”कहीं ये मैं तो नहीं”.

मुझे चाहिए एक तख्खलुस
क्योंकि मिलने लगी हैं कुछ युवतियां मेरी पत्नी से,
सुबह, शाम, दोपहर छत के मुंडेर पर.
मुझे डर है कहीं वो लेती न हो मेरा नाम.

मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि लिखे जो ख़त कभी वो युवतियां,
नहीं पहुँच पाए वे मेरी पत्नी के हाथ.
न मालूम हो किसी को तख्खलुस वाले का नाम.

मुझे चाहिए एक तख्खलुस.
कि न सुनूं जब गालियाँ दें कोई सरेआम.
देगा वो गालियाँ मेरे तख्खलुस को, देने दो.
मुझे कहाँ आदत सुनने का कोई और नाम.

मुझे चाहिए एक तख्खलुस
कि कोई नेता जब कभी भड़क जाए.
लाख चाह कर भी मेरी भनक ना पाए,
क्योंकि उसे कहाँ पता होगा मेरा नाम.

मुझे चाहिए एक तख्खलुस.
लिखने के कारण कहीं बदनाम जो हो जाऊं
तो लोग बाग़ न पुकारें मुझे मेरे नाम से.
और जा सकूं बाहर, सुकून से अपने काम से.

मुझे चाहिए एक तख्खलुस
हाँ बस उन्ही बुरे दिनों के लिए.
यही कौतुक है. वर्ना क्या कम है
मेरा नाम जिन्दगी भर के लिए.