एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
तुम ही कहो ना
तेरे नयना ऐसे सजना
जो ले जाते मेरे चैना
जो ना दिखे तो दिल घबराए
साँस रुके जब सामने आए
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
लहरों सी हैं तेरी बातें
जैसे वो धारा पर डोलें
मेरा मन भी खाए हिंडोले
चांदनी रात में जब तू बोले
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
मचल मचल कर दिल दहलाए
जब भी तुम सपने में आए
तुम इतने हो चंचल साथी
जैसे कोई नदी में हाथी
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
सोते सोते गा लेती हूँ
सो जाती हूँ गाते गाते
दिन तो लगता सपने जैसा
रात हो जैसे साथी अपना
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
जब तक सजन तुम न आते
तब तक तुम मेरे नींदों में हो
फिर जागें क्यों मेरे नयना
लोग कहें मुझे बावरी सजना
ऐसा क्यों हैं तुम ही कहो ना.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on February 10, 2009 at 5:11 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

