एक हिन्दी-मैथिली ब्लॉग
जिज्ञासा: एक मनुज धर्म
भूल हो जाती है
ललक पड़ता है ये मन
जब उत्सुकता खींच लाती
चेतना से बचपन में.
क्या करुँ मैं अज्ञान.
रहता नहीं परिपक्व चिंतन
जो हुआ प्रसन्न कभी.
छूट जाते होश मेरे
है फिर वही एक चूक होता.
एक चूक!
डरा देती चित्त चपल को.
जैसे साईकिल से नवयुवक
को गिरा देती सड़क है.
डर समा जाता है ऐसे,
बुरबुराता मन है कोई
जैसे बालक का सिहर कर.
फिर चेतनता खींच लाती
सिखाती व्यवहार मुझको.
आप तो ठहरे महान!
एक बालक सा अड़ा मैं.
नहीं मानता अपराधबोध
तोड़ कर ज्यों फूलदान.
मन आपका, पीड़ आपकी,
सही गलत तहरीर आपकी
मान करुँ जो न अकर्म.
तो कहो कैसे निभाऊं
मैं मूढ़मति निज मनुज धर्म.
| Print article | This entry was posted by दरभंगिया on April 21, 2009 at 6:39 pm, and is filed under कवितायेँ. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |


about 2 years ago
अच्छी कविता है.